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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-27, अगस्त, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। कविता ।।

 

 

भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा

युवा लेखन पुरस्कार से सम्मानित कवि की रचनाएँ

 

लिखना ज़रूरी लगा मुझे

 

यदि

मेरी समस्याओं का समाधान न होता

या फिर

राहों के जंगल में

मुझे युक्ति-युक्त मार्ग न मिलता

तो मेरा

शब्दों की बस्ती में उठना-बैठना

किसी भी लालच में पड़ कर

छूट गया होता।

 

मैं लिखता हूँ

इसलिए नहीं कि मैं लिखना चाहता हूँ,

मैं न लिखता

यदि लिखने से

मुझे मेरे प्रश्नों के हल न मिले होते।

 

लिखना ज़रूरी लगा मुझे

एक (?) बड़े जीवन को

उसके छोटेपन से मुक्त करने के लिए।

आँसुओं को बचाने के लिए

दर्द को समेटने के लिए

और

ख़ुशियों को

उनका अधिकार दिलाने के लिए

-लिखना ज़रूरी लगा मुझे।

 

जीवन के अंधेरे अध्यायों में चलते हुए

मैं उसे मेटना नहीं चाहता

उन्हें पढ़ कर

जीवन को दो क़दम भर होने से

बचाना चाहता हूँ।

 

मैं जानता हूँ, कि

मैं असुरक्षित हूँ यहाँ

पर

सुरक्षा की किलेदारी भी

नहीं चाहिए मुझे,

कुछ खिड़कियाँ

और उनके बाहर का

पूरा आसमान

ज़रूरी है

मेरे जीने के लिए।

 

चूँकि स्वतंत्रता ही

पल-पल का उद्देश्य है

इसलिए

कोई हथियार उठा कर चलना

ज़रूरी लगा मुझे।

 

झुकने नहीं देना है

वे सभी चीज़े

जो तनी हुई अच्छी लगती हैं

जैसे सिर, शब्द या परचम।

 

मैं लिखता हूँ, क्योंकि

लिखना बिगुल बजाना है

लगातार फ़हराते रहने का नाम है

-लिखना

    रविकांत

पी-201, नेहरू इन्क्लेव

गोमती नगर, लखनऊ, (उ.प्र.)

 ◙◙◙

 

स्मरणीय

नागार्जुन

शमशेर बहादुर सिंह

पुरस्कृत

रविकांत की 10 कविताएँ

- लिखना ज़रूरी लगा मुझे

- बुरे दिनों में

- जीवन भीम, पलाशी

- संजीव हुसैन

- लंकेश और घोड़े

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- कुल की कथा

- माँ :  दो कविताएँ

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