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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-27, अगस्त, 2008

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।। कविता ।।

 

 

चंदू, मैंने सपना देखा

 

चंदु, मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हिरनौटा

चंदु, मैंने सपना देखा, अमुआ से हूँ पटना लौटा

चंदु, मैंने सपना देखा, तुम्हें खोजते बद्री बाबु

चंदु, मैंने सपना देखा, खेल-कूद में हो बेकाबू

 

चंदु, मैंने सपना देखा, कल परसों ही छूट रहे हो

चंदु, मैंने सपना देखा, खूब पतंगे लूट रहे हो

चंदु, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलैंडर

चंदु, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मै हूँ बाहर

चंदु, मैंने सपना देखा, अमुआ से पटना आए हो

चंदु, मैंने सपना देखा, मेरे लिए शहद लाए हो

 

चंदु, मैंने सपना देखा, फैल गया है सुयश तुम्हारा

चंदु, मैंने सपना देखा, तुम्हें जानता भारत सारा

चंदु, मैंने सपना देखा, तुम तो बहुत बड़े डॉक्टर हो

चंदु, मैंने सपना देखा, अपनी ड्यूटी में तत्पर हो

 

चंदु, मैंने सपना देखा, इम्तिहान में बैठे हो तुम

चंदु, मैंने सपना देखा, पुलिस-यान में बैठे हो तुम

चंदु, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ बाहर

चंदु, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलैंडर

(रचनाकालः 1976)

नागार्जुन

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स्मरणीय

नागार्जुन

शमशेर बहादुर सिंह

पुरस्कृत

रविकांत की 10 कविताएँ

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अनिल मिश्र

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आशुतोष दुबे

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