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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-27, अगस्त, 2008

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।। कविता ।।

 

 

ओवल पर बांग्लादेश   

 

धीरे-धीरे पसरी थीं

दंभ से अकड़े चेहरे पर शिकस्त की परछाइयाँ

नौसखिया बांग्लादेशी क्रिकेट टीम ने

तनी हुई छातियों के बीच

ओवल के मैदान पर

कील ठोक कर रचा था एक इतिहास

और घमंड से अकड़ी गर्दन

धरती में गड़ गई थी शर्म से

 

बांग्लादेश की जीत पर

मैंने भी मनया था जश्न इसलिए नहीं कि

वह हमारा पड़ोसी था

इसलिए भी नहीं कि

उसने हमसे सीखा है क्रिकेट खेलना

इसलिए भी नहीं कि मुसलिम बहुल देश है बांग्लादेश

और टीम के ज़्यादातर खिलाड़ी हैं मुसलमान

हालाँकि भीतर एक पल को कहीं कौधा था सवाल कि

अशरफुल के शतक पर तालियाँ बजाने

और उसके शान में क़सीदे पढ़ने पर

कोई फिर कठघरे में खड़ा न कर दे मुझे

मेरी पहचान, मेरी देशभक्ति, मेरी राष्ट्रीयता पर

खड़ा न कर दिया जाए सवाल

अक्सर किसी इंज़माम, किसी सईद अनवर

या किसी वसीम अकरम की तारीफ़ करने पर

हम जैसे लोगों को एक पल में ही

घोषित कर दिया जाता है पाकिस्तानी

इसलिए भीतर एक डर भी था और शंका भी

पर इस बार कहीं कुछ नहीं हुआ

न किसी ने कठघरे से खड़ा किया न ही उठाए सवाल

 

विश्व चैंपियन आस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़

मैदान पर उतरी थी बांग्लादेशी टीम

तो किसने कल्पना की होगी भला

बांग्लादेश के जीतने की

लेकिन कुछ गुज़रने और

मर मिटने की अच्छा लिए

मैदान पर उतरे थे हमारे पड़ोसी देश के खिलाड़ी

इसलिए उस रात उन्हें जीतने देखना अच्छा लगा था

 

शतक बना कर आउट होने वाले अशरफुल को

  फ़ज़ल इमाम मल्लिक

जनसत्ता, नई दिल्ली

 ◙◙◙

 

स्मरणीय

नागार्जुन

शमशेर बहादुर सिंह

पुरस्कृत

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