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बच्चा
बच्चा मुस्कुराता है
गुँजती है अज़ानों की आवाज़
बच्चा खिलखिलाता है
बजती है मंदिरों की घंटियाँ
बच्चा हँसता है
क़ुरान की आयतें
उभरती है कहीं भीतर
इठलाता है बच्चा
और श्कलों से गूँजने लगता है पूरा माहौल
बच्चा तुतलाता है
गुरबाणी की इबादतें उतरने लगती हैं
धीरे-धीरे हमारे अंदर
बच्चों का लड़ना-झगड़ना
रूठना और मनना
ठुमक-ठुमक कर चलना
दुनियां को कई रंगों से करा जाता है परिचित
बच्चो हैं तो
रंग है, ख़ुश्बू है
इंद्रधनुष है, फूल है
तितलियाँ, हरियाली है
जीवन है
शब्द हैं, कविताएँ हैं
और हम हैं
ज़रा सोचो
बच्चे नहीं होते तो क्या होता
फूलों को, रंगों को
ख़ुशबूओं को
हरियाली को
शब्दों को
कविता को
और अपने आप को बचाना है
तो ज़रुरी है कि
बच्चे इसी तरह
खिलखिलाते, मुस्कुराते, तुतलाते रहें
जब तक रहेंगे बच्चे
तब तक रहेंगे हम
और बची रहेगी दुनिया
फ़ज़ल इमाम
मल्लिक
जनसत्ता, नई दिल्ली
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