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सृजनगाथा
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वर्ष-3, अंक-27, अगस्त, 2008
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।। कविता ।।
रिवाज़
मुख में कुछ
मन में कुछ
यह चलन है
यह रिवाज़ है
आज के लोगों की पसंद का
यह चलन हो सकता है
राजनीति का
धर्म प्रमुख का
अमीर का
और पाखंडी का
परन्तु निर्धन का नही
सदपुरूष का नही
शंका और भ्रम का धुंधलापन
और इनका घातक प्रतिबिम्ब
मीठा बन अपने वश करना
ये तो है इनकी परिभाषा
बुने बनाये शब्द
ये है इनका चलन
झिलमिल हैं इनके परिधान
थोथे, नाटकीय प्रभाव
यह सभ कुछ देन है
इनके चलन और रिवाज़ की
इनके अंदाज़ का
क्या निकलेगा परिणाम
ये समय ही बतायेगा
पर जो लोग सच को कड़वा जान
चखने से डरते हों
उन लोगों को यह रिवाज़
बना लेता है अपना दास
धवन भगत
रेडियो सबरंग
डेनमार्क
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स्मरणीय
नागार्जुन
शमशेर बहादुर सिंह
पुरस्कृत
रविकांत की 10 कविताएँ
- लिखना ज़रूरी लगा मुझे
- बुरे दिनों में
- जीवन भीम, पलाशी
- संजीव हुसैन
- लंकेश और घोड़े
- यात्रा
- कुल की कथा
- माँ : दो कविताएँ
- चाय
- कविता
समकालीन कवि
देवांशु पाल
अनिल मिश्र
असद ज़ैदी
आशुतोष दुबे
विश्वरंजन
प्रवासी कलम
धवन भगत, डेनमार्क
- प्रयोग
- रिवाज़
- जीवन है प्रवाह
हरिहर झा, आल्ट्रेलिया
माह का कवि
फ़ज़ल इमाम मल्लिक
... बच्चा
... ख़ामोश हैं बच्चे
... ख़ौफ़ में डूबा शहर
... विंबलडन-2005
... ओवल पर बांग्लादेश
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