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नाटक
समन्दर पार कँटीली झाड़ी के पीछे
झोपड़ी के आँगन में
भले सताती चिंताएँ और बढ़ती धड़कन
पर जहाँ मिलती थी
प्रेम की सौगात
चाहता तो ले लेता
हँसते हुए
लेकिन ठहराव से विद्रोह करके
यहाँ तो फँस गया दुविधा में
धुँधलाई शाम में बीयर की बोतल खुलने पर
चाँद ने
जब अँधियारे को चूमा
तो मेरी शान से सजाई हुई
बत्तियों को
अस्तित्व का ख़तरा नज़र आया
मैंने मुँह बिचका लिया
तन गई एक-एक नस
जिसकी थकान ही
लिख डालती सलवटें बिस्तर पर ।
जागते हुए देख रहा हूँ सपना कि
नींद नहीं आती डालर के नोटों पर
कितनी अच्छी थी बाजरे की रोटी
सरसों का साग
क्योंकि यहाँ पर
हर मुस्कान शिष्टाचार के विरूद्ध है
ख़ुश होने का अर्थ
देशद्रोह, एक घमंड, एक पाखंड
जो कविता की आत्मा के ख़िलाफ़ है
तो भीगो ले अपने तकिये
स्वार्थ पर प्रेम की और
देह पर आत्मा की जीत के लिए
भोग पर अध्यात्म की जीत के लिए
रोना न आये तो रो ले
ग्लीसरीन लगाकर
!
समझ ले टपकते आँसू एक सस्कृति हैं ।
हरिहर झा
2, बिल्बी स्ट्रीट,
मोराबिन,
मेल्बर्न, आस्ट्रेलिया - 3189
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