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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-27, अगस्त, 2008

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।। गीत ।।

 

 

मैं भविष्य-पथ पर

 

मेरे मन का पाँवों से गहरा नाता है

जैसे नदियों का अपनी कर्मठ लहरों से !

 

मैंने स्वप्नों को अपना यह पाँव दिया है

और पाँव को स्वप्नों के हैं पँख सुनहले

समतल से लेकर खदान तक गति है मेरी

दुर्गम कठिन चढ़ाई पर पहुँचा मैं पहले

सप्त सिंधुओं की लय गुंफित मन-प्राणों में

पल की पल में तोडूँ हद मैं निकल घरों से !  

 

मेरे पथ पर कभी हेनरी और तेनसिंग

कभी कोलम्बस, आर्मस्ट्राँग मुझको मिल जाते

वे अगम्य का लक्ष्य साधने वाले धावक

'चरेवैति' का गूढ़ मर्म मुझको समझाते

मेरे पथ-पड़ाव के संगी वन-पर्वत हैं

जिनसे हँस-बतियाता अपने सुगम स्वरों से !

 

मेरा हर दिन पुनर्नवा-मन के गति-पथ-सा

कृष्णवर्त्मा रात-पलक की बनी आभरण

मेरे भाव-अभाव, हार या जीत सभी ज्यों

पत्रोत्कंठित जीवन के बन गये व्याकरण

लिए असीमित कोश समय के वर्ण-गंध का

मैं भविष्य-पथ पर बढ़ता खुदती नहरों से !

   हृदयेश्वर

गीतायन, प्रेमनगर, रामभद्र (रामचौरा)

हाज़ीपुर (वैशाली) बिहार - 844101

 ◙◙◙

 

माह का छंदकार

शरद सिंह

- सुरों में ढली हुई लड़की

- सपनों में डूबी लड़की

- अपनी चाह कहो लड़की

- मधुशाला उजड़ी है

- शीतल लहरें सोच रही हैं

ग़ज़ल

बेकल' उत्साही

ज़िया ज़मीर

विनीता गुप्ता

डॉ. महेन्द्र अग्रवाल

अमर ज्योति

गीत

देवमणि पांडेय

डॉ. दीप्ति गुप्ता

डॉ. दिवाकर वर्मा

हृदयेश्वर

दोहा

डॉ. रामनिवास मानव

 अजय गाथा

इंदप्रस्थ बदनाम है

 

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