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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-27, अगस्त, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

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।। गीत ।।

 

 

पटरी से गाड़ी उतरी

 

पटरी से गाड़ी उतरी

कुछ गहरी साज़िश है ।

 

चालक-परिचालक ने शायद झपकी ले ली थी

या उकोची कंचनमृग ने बाज़ी खेली थी

इन्द्र-वृत्ति के प्रति यह

जनता की साज़िश है ।

 

सपने रहे दिखाते, भू पर स्वर्ग उतर आया

भूखे होरी धनिया को यह फ्रॉड नहीं भाया

अंतर भदरंगा, ऊपर

चमकीली पॉलिश है ।

 

अपने प्रिय की रबड़ी इनको किंचित नहीं जँचे

छाछ विदेशी पैकिंग, उस पर राधा ख़ूब नचे

देशी छोड़ विदेशी

उनको लगती ख़ालिश है ।

 

बाच नोंचते रहें पँख, नभ में हर पाँखी के

पर वे चलते रहें सहारे, बस वैशाखी के

भले गोधरा या जम्मू

आतिश ही आतिश है ।

   डॉ. दिवाकर वर्मा

साधना, 150, सागर एस्टेट

मेन बायपास रोड़, भोपाल, मध्यप्रदेश

 ◙◙◙

 

माह का छंदकार

शरद सिंह

- सुरों में ढली हुई लड़की

- सपनों में डूबी लड़की

- अपनी चाह कहो लड़की

- मधुशाला उजड़ी है

- शीतल लहरें सोच रही हैं

ग़ज़ल

बेकल' उत्साही

ज़िया ज़मीर

विनीता गुप्ता

डॉ. महेन्द्र अग्रवाल

अमर ज्योति

गीत

देवमणि पांडेय

डॉ. दीप्ति गुप्ता

डॉ. दिवाकर वर्मा

हृदयेश्वर

दोहा

डॉ. रामनिवास मानव

 अजय गाथा

इंदप्रस्थ बदनाम है

 

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तकनीकः प्रशांत रथ

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