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पटरी से गाड़ी उतरी
पटरी से गाड़ी उतरी
कुछ गहरी साज़िश है ।
चालक-परिचालक ने शायद झपकी ले ली थी
या उकोची कंचनमृग ने बाज़ी खेली थी
इन्द्र-वृत्ति के प्रति यह
जनता की साज़िश है ।
सपने रहे दिखाते, भू पर स्वर्ग उतर आया
भूखे होरी धनिया को यह फ्रॉड नहीं भाया
अंतर भदरंगा, ऊपर
चमकीली पॉलिश है ।
अपने प्रिय की रबड़ी इनको किंचित नहीं जँचे
छाछ विदेशी पैकिंग, उस पर राधा ख़ूब नचे
देशी छोड़ विदेशी
उनको लगती ख़ालिश है ।
बाच नोंचते रहें पँख, नभ में हर पाँखी के
पर वे चलते रहें सहारे, बस वैशाखी के
भले गोधरा या जम्मू
आतिश ही आतिश है ।
डॉ. दिवाकर वर्मा
साधना, 150,
सागर एस्टेट
मेन बायपास
रोड़, भोपाल, मध्यप्रदेश
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