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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-27, अगस्त, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। गीत ।।

 

 

थके पाँव  देखते  हैं मुझे 

 

खिंच गई चेहरे पे लकीरें आके टूटे दिल से

छुपा  रखा   था  जो   दर्द   परतों  में

रह - रह  के   लगा  रिसने   फिर  से !

 

चाहा     था    जितना     दूर   रहना

जुड़ती  गई  उतना   ही  गहरे  उन  से

उनकी    ओर    दौड़ता    रहा    मन

जाती   जितना   पीछे   मैं   तेज़ी  से !

 

 बीते   समय   की   दीवारों   में   कैद

रिश्ते   मुस्कुराते    हैं  -   हौले    से

आलों,    झरोखों    में    बसी    यादें,

उदासी  में  खिलखिलाती  हैं- शोखी  से !

 

 समय के साथ  क़दम  से क़दम मिला के

चलती   रही   यूँ   तो   हिम्मत    से

पर,    बीतते    समय     के    साथ

अब थके पाँव  देखते  हैं मुझे  हैरत  से !

 

न     पीछे       लौटना     मुमकिन

न     आगे   बढ़ना    है     आसान

एक   ठहराव   पे   ठिठक   गई   है

ज़िन्दगी  जैसे   एक     मुद्दत    से

   डॉ. दीप्ति गुप्ता

    २ -ए, आकाशदूत, १२ - ए, नॉर्थ एवेन्यू,

    कल्याणी नगर, पुणे - ४११००६

 ◙◙◙

 

माह का छंदकार

शरद सिंह

- सुरों में ढली हुई लड़की

- सपनों में डूबी लड़की

- अपनी चाह कहो लड़की

- मधुशाला उजड़ी है

- शीतल लहरें सोच रही हैं

ग़ज़ल

बेकल' उत्साही

ज़िया ज़मीर

विनीता गुप्ता

डॉ. महेन्द्र अग्रवाल

अमर ज्योति

गीत

देवमणि पांडेय

डॉ. दीप्ति गुप्ता

डॉ. दिवाकर वर्मा

हृदयेश्वर

दोहा

डॉ. रामनिवास मानव

 अजय गाथा

इंदप्रस्थ बदनाम है

 

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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