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थके पाँव देखते हैं मुझे
खिंच गई चेहरे पे लकीरें आके टूटे दिल से
छुपा रखा था जो दर्द परतों में
रह - रह के लगा रिसने फिर से
!
चाहा था जितना दूर रहना
जुड़ती गई उतना ही गहरे उन से
उनकी ओर दौड़ता रहा मन
जाती जितना पीछे मैं तेज़ी से
!
बीते
समय की दीवारों में कैद
रिश्ते मुस्कुराते हैं - हौले से
आलों, झरोखों में बसी यादें,
उदासी में खिलखिलाती हैं- शोखी से
!
समय
के साथ क़दम से क़दम मिला के
चलती रही यूँ तो हिम्मत से
पर, बीतते समय के साथ
अब थके पाँव देखते हैं मुझे हैरत से
!
न पीछे लौटना मुमकिन
न आगे बढ़ना है आसान
एक ठहराव पे ठिठक गई है
ज़िन्दगी जैसे एक मुद्दत से
!
डॉ. दीप्ति गुप्ता
२ -ए,
आकाशदूत, १२ - ए,
नॉर्थ एवेन्यू,
कल्याणी नगर,
पुणे - ४११००६
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