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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-27, अगस्त, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। ग़ज़ल ।।

 

 

शीतल लहरें सोच रही हैं

 

रात चाँद की गठरी ढो कर,  पूरब - पश्चिम एक करे।

नींद स्वप्न के पोखर में से, अंजुरी-अंजुरी स्वप्न भरे।

 

घर के आँगन में  फैली है,  आम, नीम  की परछाईं

जैसे  आँगन में  बिखरें हों, काले - काले  पात झरे।

 

उजले रंग की चादर ओढ़े,  नदिया  सोई है  चुपचाप

शीतल लहरें सोच रहीं हैं - कल क्या होगा, कौन डरे।

 

कोई  सोते-सोते  में  जब  मुस्का  दे  यूँ  हौले से

समझो, उसने  देख  लिए हैं, स्वप्न सुनहरे, हरे-भरे।

 

बड़ा बृहस्पति तारा चमके, जब  मुण्डेर के कोने पर

ऐसा लगता है, छप्पर ही  खड़ा  हुआ  है  दीप धरे।

 

यूँ तो अपनापन सिमटा है,  मंद हवा के झोंकों  में

फिर भी कोई अपना आए, कहता है मन, राम करे ।

    डॉ. सुश्री शरद सिंह

एम-111, शांतिविहार, रजाखेड़ी, सागर (म.प्र.) - 470004

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माह का छंदकार

शरद सिंह

- सुरों में ढली हुई लड़की

- सपनों में डूबी लड़की

- अपनी चाह कहो लड़की

- मधुशाला उजड़ी है

- शीतल लहरें सोच रही हैं

ग़ज़ल

बेकल' उत्साही

ज़िया ज़मीर

विनीता गुप्ता

डॉ. महेन्द्र अग्रवाल

अमर ज्योति

गीत

देवमणि पांडेय

डॉ. दीप्ति गुप्ता

डॉ. दिवाकर वर्मा

हृदयेश्वर

दोहा

डॉ. रामनिवास मानव

 अजय गाथा

इंदप्रस्थ बदनाम है

 

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