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शीतल लहरें सोच रही हैं
रात चाँद की गठरी
ढो कर, पूरब - पश्चिम एक करे।
नींद स्वप्न के
पोखर में से, अंजुरी-अंजुरी स्वप्न भरे।
घर के आँगन में
फैली है, आम, नीम की परछाईं
जैसे आँगन में
बिखरें हों, काले - काले पात झरे।
उजले रंग की चादर
ओढ़े, नदिया सोई है चुपचाप
शीतल लहरें सोच
रहीं हैं - कल क्या होगा, कौन डरे।
कोई सोते-सोते
में जब मुस्का दे यूँ हौले से
समझो, उसने देख
लिए हैं, स्वप्न सुनहरे, हरे-भरे।
बड़ा बृहस्पति
तारा चमके, जब मुण्डेर के कोने पर
ऐसा लगता है,
छप्पर ही खड़ा हुआ है दीप धरे।
यूँ तो अपनापन
सिमटा है, मंद हवा के झोंकों में
फिर भी कोई अपना
आए, कहता है मन, राम करे ।
डॉ. सुश्री शरद
सिंह
एम-111,
शांतिविहार,
रजाखेड़ी,
सागर (म.प्र.)
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470004
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