|
मधुशाला उजड़ी है
खालीपन है, रहा
नहीं कुछ बाक़ी अब तो।
वो भी मेरे
जैसा है एकाकी अब तो।
एक लपट में राख
हुआ सपनों का जंगल
रंग दिखाई
देते धूसर, खाकी अब तो।
मिलन अचानक
बिछुड़न में बदला है ऐसे
मधुशाला उजड़ी
है, रोती साकी अब तो।
पिसने को
तैयार हृदय का दाना-दाना
नियति चला ले
चाहे जैसी चाकी अब तो।
धुँआ हो गया
‘शरद’
आज चाहत का संदल
संवादों की
खोई है बेबाकी अब तो।
डॉ. सुश्री शरद
सिंह
एम-111,
शांतिविहार,
रजाखेड़ी,
सागर (म.प्र.)
-
470004
◙◙◙
|