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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-27, अगस्त, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। ग़ज़ल ।।

 

 

सपनों में डूबी लड़की

 

होंठों पर  हँसती दिखती है,  पलकों में रोती लड़की।

सपनों की झालर बुनकी है, तनिक बड़ी होती लड़की।

 

चूल्हा-चौका, कपड़े, बरतन, बचपन से ही जुड़ जाते

परिपाटी की बंद सीप में, क़ैद रही मोती - लड़की।

 

गुड्डे-गुड़िया, खेल-खिलौने, पल में ओझल हो जाते

अपने  छोटे भाई-बहन को, बाँहों में  ढोती लड़की।

 

इसकी पत्नी, उसकी बेटी, जाने क्या-क्या कहलाती

नाते-रिश्ते, सम्बोधन में ख़ुद को ही खोती लड़की।

 

दिन का सूरज, रात के तारे या सपनों का शहज़ादा

सारी  दुनिया  पा लेती है,  सपनों में डूबी लड़की।

   डॉ. सुश्री शरद सिंह

एम-111, शांतिविहार, रजाखेड़ी, सागर (म.प्र.) - 470004

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माह का छंदकार

शरद सिंह

- सुरों में ढली हुई लड़की

- सपनों में डूबी लड़की

- अपनी चाह कहो लड़की

- मधुशाला उजड़ी है

- शीतल लहरें सोच रही हैं

ग़ज़ल

बेकल' उत्साही

ज़िया ज़मीर

विनीता गुप्ता

डॉ. महेन्द्र अग्रवाल

अमर ज्योति

गीत

देवमणि पांडेय

डॉ. दीप्ति गुप्ता

डॉ. दिवाकर वर्मा

हृदयेश्वर

दोहा

डॉ. रामनिवास मानव

 अजय गाथा

इंदप्रस्थ बदनाम है

 

 

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तकनीकः प्रशांत रथ

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