|
सपनों में डूबी लड़की
होंठों पर हँसती दिखती है, पलकों में रोती लड़की।
सपनों की झालर बुनकी है, तनिक बड़ी होती लड़की।
चूल्हा-चौका, कपड़े, बरतन, बचपन से ही जुड़ जाते
परिपाटी की बंद सीप में, क़ैद रही मोती - लड़की।
गुड्डे-गुड़िया, खेल-खिलौने, पल में ओझल हो जाते
अपने छोटे भाई-बहन को, बाँहों में ढोती लड़की।
इसकी पत्नी, उसकी बेटी, जाने क्या-क्या कहलाती
नाते-रिश्ते, सम्बोधन में ख़ुद को ही खोती लड़की।
दिन का सूरज, रात के तारे या सपनों का शहज़ादा
सारी दुनिया पा लेती है, सपनों में डूबी लड़की।
डॉ. सुश्री शरद
सिंह
एम-111,
शांतिविहार,
रजाखेड़ी,
सागर (म.प्र.)
-
470004
◙◙◙
|