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सृजनगाथा
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वर्ष-3, अंक-27, अगस्त, 2008
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।। ग़ज़ल ।।
हम जैसा कोई न था
क्या सफ़र था! राह-ओ-मंजिल का निशाँ कोई न था काफ़िला कोई न था; और कारवाँ कोई न था । हमने ही अपने तसव्वुर से तुझे इक शक्ल दी. हम न थे तो तू; तेरा नाम-ओ-निशां कोई न था । कैसा जंगल था जहाँ वनवास पर भेजे गए हर तरफ़ अशजार थे, साया वहाँ कोई न था । दिल के दरवाज़े पे दस्तक बारहा होती रही हमसे मिलने को मगर आया वहाँ कोई न था । आईनों के शहर में हर सिम्त हम थे; सिर्फ़ हम हम चले आए तो हम जैसा वहाँ कोई न था ।
डॉ. अमर ज्योति
7-सरस्वती विहार, रामघाट रोड़
अलीगढ़ - उ.प्र.- 202001
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माह का छंदकार
शरद सिंह
- सुरों में ढली हुई लड़की
- सपनों में डूबी लड़की
- अपनी चाह कहो लड़की
- मधुशाला उजड़ी है
- शीतल लहरें सोच रही हैं
ग़ज़ल
बेकल' उत्साही
ज़िया ज़मीर
विनीता गुप्ता
डॉ. महेन्द्र अग्रवाल
अमर ज्योति
गीत
देवमणि पांडेय
डॉ. दीप्ति गुप्ता
डॉ. दिवाकर वर्मा
हृदयेश्वर
दोहा
डॉ. रामनिवास मानव
अजय गाथा
इंदप्रस्थ बदनाम है
संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति
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