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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-27, अगस्त, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। ग़ज़ल ।।

 

 

दिल वो दुखा कि यार बस

 

देखी नहीं सुनी नहीं ऐसा वफ़ा कि यार बस ।

वादे पे मेरे शख़्स वो ऐसे जिया कि यार बस ।

 

चाहीं मोहब्बतें अगर उससे तमाम उम्र की

सन्दली हाथ, हाथ पर ऐसे रखा कि यार बस ।

 

ज़हन में यूँ ही आ गया तेरा ख़्याल एक शब

तारों से सारा आसमां ऐसा सजा कि यार बस ।

 

मैंने ज़रा-सी देर ही देखा था यार को अभी

जाने वो क्यों सिमट गया कहने लगा कि यार बस ।

 

बस इक नज़र की बात थी जिसने तबाह कर दिया

दिल इक था जिस पे नाज़ था ऐसा लुटा किया यार बस ।

 

होने को और भी बहुत हमसे हुए जुदा मगर

तू जो ज़रा जुदा हुआ दिल वो दुखा कि यार बस ।

 

उसने कहा सुनो 'ज़िया' सज-धज के कुछ रहा कर

मुझको न जाने क्या हुआ ऐसा सजा कि यार बस ।

   ज़िया ज़मीर

निकट ज़ैन बुक डिपो

चौकी हसन खां, मुरादाबाद - 244001

 ◙◙◙

 

माह का छंदकार

शरद सिंह

- सुरों में ढली हुई लड़की

- सपनों में डूबी लड़की

- अपनी चाह कहो लड़की

- मधुशाला उजड़ी है

- शीतल लहरें सोच रही हैं

ग़ज़ल

बेकल' उत्साही

ज़िया ज़मीर

विनीता गुप्ता

डॉ. महेन्द्र अग्रवाल

अमर ज्योति

गीत

देवमणि पांडेय

डॉ. दीप्ति गुप्ता

डॉ. दिवाकर वर्मा

हृदयेश्वर

दोहा

डॉ. रामनिवास मानव

 अजय गाथा

इंदप्रस्थ बदनाम है

 

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