|
अपनी तासीर बता
क्या हुआ क्या न हुआ तुझको मयस्सर न बता ।
अपनी तासीर बता अपना मुकद्दर न बता ।
मान लूँगा मैं तुझे क़द के बराबर अपने
शायरी सीख मगर ख़ुद को सुखनवर न बता ।
आज की रात ठहर घर मे न दीवार उठा
आख़िरी वक़्त बुजुर्गों को ये मंज़र न बता ।
आज तहज़ीब न दहलीज पे रख दे गुरबत
गाँव तेरा है ख़ुदा ऐसा कोई घर न बता ।
कुछ हुकूमत के नए रंग चढ़े हैं तुझ पर
तू सिकन्दर है अभी ख़ुद को पयम्बर न बता ।
ये हक़ीक़त कहीं आँखों में न भर दे आँसू
देखना यूँ तो ज़रूरी है बहुत, पर न बता ।
प्यास मुद्दत से यही जिस्म को बरते आदम
यार दोज़ख के हमें साँप छछूंदर न बता ।
डॉ. महेन्द्र
अग्रवाल
संपादक-नई
ग़ज़ल
रामेश्वरम्
सदर बाज़ार, शिवपुरी, मध्यप्रदेश
◙◙◙
|