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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-27, अगस्त, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। दोहा ।।

 

 

जीवन का नेपथ्य

 

सीता-सी संवेदना, व्याकुल और उदास।

मन वैरागी राम-सा, जीवन है वनवास॥

 

बिकने को तैयार है, जिनका आज चरित्र।

छपता है अख़बार में, अब उनका ही चित्र॥

 

पुलिस-विफलता से बढ़ा, जब-जब भी जनरोष।

मुठभेड़ों के नाम पर, मरे कई निर्दोष॥

 

कुत्ता खाये पूरियाँ, बिल्ली खाये खीर।

मगर दुष्ट के द्वार पे, भूखा मरे फ़क़ीर॥

 

जो अंधे, मतिमन्द हैं, बहरे दोनों कान।

अधरों पर उनके मिली, एक इंच मुस्कान॥

 

अब ऐसी-कुछ हो गई, दुनिया की तासीर।

दो ही ख़ुश हैं अब यहाँ, पागल और फ़क़ीर॥

 

भुतहा-भुतहा वक्त है, सहमी-सहमी आग।

सन्नाटों के दौर में, कैसा जीवन-राग॥

 

धूल-धुआँ खुशियाँ हुई, पीर हुई अख़बार।

सुर्ख़ी सुर्ख़ अभाव की, बांचें कितनी बार॥

 

जब-जब भी पर्दा उठा, दिखा अधूरा सत्य।

अनदेखा ही रह गया, जीवन का नेपथ्य॥

 

वही पालकी देश की, जनता वही कहार।

लोकतन्त्र के नाम पर, बदले सिर्फ़ सवार॥

 

लहराने नेता लगे, बजी चुनावी बीन।

सत्ता के सुर-ताल पर, होता नहीं यक़ीन॥ 

   डॉ. रामनिवास मानव

706, सैक्टर -13, हिसार, 125005 (हरियाणा)

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माह का छंदकार

शरद सिंह

- सुरों में ढली हुई लड़की

- सपनों में डूबी लड़की

- अपनी चाह कहो लड़की

- मधुशाला उजड़ी है

- शीतल लहरें सोच रही हैं

ग़ज़ल

बेकल' उत्साही

ज़िया ज़मीर

विनीता गुप्ता

डॉ. महेन्द्र अग्रवाल

अमर ज्योति

गीत

देवमणि पांडेय

डॉ. दीप्ति गुप्ता

डॉ. दिवाकर वर्मा

हृदयेश्वर

दोहा

डॉ. रामनिवास मानव

 अजय गाथा

इंदप्रस्थ बदनाम है

 

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