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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-27, अगस्त 2008

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।। भाषांतर ।।

 

 पंजाबी उपन्यास(धारावाहिक-9)

रेत


हरजीत अटवाल

अनुवादः सुभाष नीरव

 

आपने अब तक पढ़ा - भाग एक / भाग दो / तीन / चार/पाँच/छः/सात/आठ) आगे पढ़िए-संपादक

 

मय कितनी तेजी से दौड़ता है, इसका अहसास अब जा कर होने लगा। अभी कल ही मेरा विवाह हुआ, कल ही परी का जन्म हुआ और आज यह इतनी बड़ी होकर मेरे सामने खड़ी थी। छोटी-सी परी मेरे साथ सो रही होती थी कभी, अब पूरा बिस्तर घेरने लगी थी। जिसे मैं कभी गोद में उठाया करती थी, अब सहेली बनती जा रही थी।

 

बचपन में परी बहुत सुन्दर थी। अधिक रोती भी नहीं थी। जब रवि ने इसे पेट पर सुलाने की आदत डाल ली थी, तब थोड़ा तंग करने लग पड़ी थी। नर्सरी में जाते समय वह वहाँ अकेली नहीं रहना चाहती थी। मम्मी को उसके पास ठहरना पड़ता। बिन्नी और नीता ने भी उसे उठा-उठाकर बिगाड़ दिया था। वे उसे खिलौना ही समझते। डैडी भी घर में घुसते ही उसे पुकारना शुरू कर देते। परी मम्मी के घर पर होती तो उनके घर की रौनक बढ़ जाती। मम्मी ने परी के जन्म पर थोड़ा-सा नाक सिकोड़ा था, पर अब बहुत प्यार करती है। रवि कहा करता, परी हमें और अधिक करीब लाएगी। मुझे मुफ्त में मिली यह एक और खुशी है। पर परी के जन्म के बाद ही सब कुछ बिगड़ गया था।

 

परी ने रेंगना सीखा, फिर चलना, फिर बोलना। जब वह कोई नई चीज़ सीखती तो वह बहुत खुश होती। वह बिलकुल रवि जैसी लगती थी। उस जैसी आँखें, चौड़ा माथा और बैठे हुए होंठ। बैठे हुए होंठ भी ऐसे कि मानो पूरा दिन बोल-बोलकर थक गये हों। जैसे ये अब मुश्किल से ही खुलेंगे।

 

जहाँ परी ने बहुत-सी बातें अपनी उम्र से पहले ही सीख ली थीं, वहीं उसका तुतलाना ज़रा ठहरकर साफ हुआ था। उसका तोतलापन, उसकी सुन्दरता में और वृद्धि करता। तुतलाकर बोलती वह बहुत प्यारी लगती।

 

हमारे घर में होती तो परी कई बार खुद को अकेला महसूस करने लगती। खास तौर पर तब, जब हम उसकी ओर ध्यान न देते। मम्मी के घर की बात और थी। वहाँ नीता, बिन्नी, मम्मी और डैडी उसके संग हर समय खेलते रहते थे। वैसे, रवि उसे व्यस्त रखने के लिए कोई न कोई उल्टी-सीधी बात सिखाता रहता। वह उससे पूछता कि तेरे मामा के कान कैसे हैं, तो परी अपने कान खींचकर दिखाने लगती। रवि पूछता कि तेरे नाना की आँखें कैसी हैं, तो वह आँखें भैंगी कर लेती। ऐसे ही, मम्मी के मुँह की नकल और नीता की तरह चलकर दिखाने लगती।

 

इसी तरह, नीता ने भी रवि के हँसने के ढंग की नकल उसे सिखा दी थी, पर परी रवि के सामने चुप रहती। कभी-कभी मुझे डर लगता कि परी लाड़-लाड़ में बिगड़ न जाये।

 

मेरा भी ध्यान हर वक्त उसी में रहता। काम पर जाती तो फोन करके उसके बारे में पूछती रहती। मम्मी खीझकर कहती, कुछ नहीं होता तेरी लड़की को।

 

जब परी की उम्र नर्सरी में जाने की हुई तो रवि उसके लिए स्कूल या नर्सरी तलाशने लगा। मैं चाहती थी कि वह मम्मी के घर के नज़दीक ही नर्सरी में जाये। एक तो उस वक्त मेरा काम भी नज़दीक था और दूसरा, मम्मी उसे नर्सरी में छोड़-ला सकती थी। रवि चाहता था कि वह आर्च-वे में ही किसी नर्सरी में जाये, पर मैंने उसे दलीलें देकर मना लिया था। जब मैं रवि से लड़कर मम्मी के घर आई, तो उस समय इस बात की बहुत सुविधा हो गयी थी। नहीं तो दुबारा उसका स्कूल बदलना पड़ता। पहले भी हम मम्मी के घर पर होते, तो रवि हमारे संग न होता, परी को उसकी प्रतीक्षा न होती। इसीलिए परी ने रवि को बहुत मिस नहीं किया था। वह जल्द ही रवि के बगै़र रहना सीख गयी थी, पर भूली नहीं थी।

परी सातवें साल में थी, जब उसने पूछा था, मम्म, डैडी कहाँ रहते हैं ? किस शहर ?

मुझे कुछ मालूम नहीं था। कुछ बता कर भी नहीं गया था। मैं उसे क्या बताती। मुझे आस थी कि वह साउथाल में होगा। उसका भाई प्रितपाल साउथाल में ही रहता था। उस पते पर उसके साथ चिट्ठी-पत्री होती थी। या फिर, बहन की ओर चला गया हो। उसकी बहन मिडलैंड में रहती थी। मैं कई बार सोचती कि रवि के घर जाऊँ। शमिंदरजीत का देवर भी साउथाल में रहता था। वह प्रितपाल को कुछ-कुछ जानता भी था। एक बार वही ख़बर लाया था कि रवि लम्बे समय के लिए इंडिया चला गया था। मुझे लगता कि जब वह मेरी परवाह नहीं करता तो मुझे उसे खोजने की क्या ज़रूरत थी।

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परी स्कूल से लौटते ही पढ़ने बैठ जाती। रात में सोने के समय भी उसके हाथ में किताब होती। मैं मन ही मन कहती–‘बाप जैसी और उसे बांहों में भर लेती। डैडी उसे इस तरह पढ़ते देखकर कहते, किताबी कीड़ा बाप की तरह! कहीं अक्ल में भी उसी की तरह न हो।... सबको पढ़ा देगी।

 

मुझे उनकी बात चुभती। कोई परिचित घर में आता तो रवि की बात शुरू करके उसको बुरा-भला कहने लगते। मुझे अच्छा न लगता। मैं वहाँ से उठ जाती। रात में सपनों में रवि आ घुसता। अब परी उसके बारे में कोई न कोई बात करने लगी थी। हम दोनों की विवाह के समय की फोटो हमारे कमरे में पड़ी थी। परी फोटो उठाती और कहती, फोटो में तो डैडी अच्छा लगता है।

अगर अच्छा होता तो तुझे देखने न आता।

नाना जी भी कहते हैं कि डैडी बुरा आदमी है, तुझे मारता था, नाना जी को भी मारा था।

मैं चुप रहती। अगर मैं कोई उत्तर देती, तो भी उसकी तसल्ली न होती। वह फिर पूछती, वह मुझे भी मारता था ?

नहीं, तुझे तो बहुत प्यार करता था।

फिर मुझे मिलने क्यों नहीं आता ?

यह तो तू उसी से पूछ लेना जब भी मिले। कहकर मैं उसे सो जाने के लिए जोर डालने लगती।

एक दिन, परी गार्डन में खेलते-खेलते डैडी की नकल उतारने लगी। हाथ में सोटी पकड़कर बायीं टांग और बांह हिलाते हुए चल रही थी। हम सब खिड़की में से देख रहे थे। मैं दौड़ कर गयी और उसे थप्पड़ दे मारा। वह डैडी’ ‘डैडी करके रोने लगी। डैडी ने उसे पास बुलाकर कहा, अब मैं ही तेरा डैडी हूँ।

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