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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-27, अगस्त 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

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।। भाषांतर ।।

 

 

 

नेपाल से परशु प्रधान की कहानी आख़िर मैं तेरा शौहर हूँ निर्मला का शेषांश...

 

"उसी लड़की के पैसों में पंद्रह-बीस रोज वीरगंज के होटल में ठहरे। वीरगंज गर्मी के बावजूद अच्छी जगह है। उसके बाद वह बोली कि यहाँ हमारे मामा रहते हैं चलो। वहाँ जाना ता कि बस.......।" बदन भर उसके बूट के नीले निशान थे। "इतनी लातें व मुक्के बरसे की बस, तीन जन्मों तक याद रहेंगे। और भी नकली मुकदमे बनाकर ठूस सकते है।"

"मुझे क्या मतलब....... मेरे लिए तो तुम मर चुके हो।"

"क्रिया-कर्म खत्म किया ? सफेद कपड़े तो नहीं हैं तेर बदन पर ?"

"तुम्हारा क्रिया-कर्म तो मेरे अन्दर है छिरिङ। बाहर के सफेद कपड़े का क्या मतलब ?"

"अब ज़्यादा गुस्सा मत कर। जो होना था सो हो गया। तेरे गुस्सा करने से वह घटना मिट तो नहीं जाएगी।" छिरिङ थोड़ा सामान्य हो रहा था।

 

यह घटना भी तो मिटनेवाली नहीं है। सारे शहर में निर्मला अकेली थी, पानी  में ठे लहर जैसे अकेली थी। फिर उसको अकेलेपन में गाँव के उस भाई ने साथ दिया था। एक दिन उसने एक बहादुर पुरूष को कमरे में ही ला खड़ा कर दिया था जो नौकरी भी दिलवा सकता था।

"तुम्हें नौकरी निर्मला ......... एक ही मिनट में...... कहाँ तक पढ़ी हो ?

"गाँव में भी कोई पढ़ता है क्या ?"

"नौकरी के लिए पढाई ज़रूरी है क्या ? अपने लोग चाहिए निर्मला यानि मेरे जैसे लोग, समझीं तुम? सारे सचिव व डायरेक्टर मैंने ही रखे है.....कहूँ तो। जहाँ कहोगी एक फ़ोन कर दूगा..... तुम्हारी नौकरी पक्की।"

"मुझे बड़ी नौकरी तो नहीं चाहिए। बस् इन बच्चों को पाल सकू और अपना गुज़ारा कर सकूं.....।"

"हाँ हाँ मैं समझता हूँ तुम्हारी बात को। महिलाओं की समस्याएं समझकर ही उन्हीं के उत्थान के लिए हमने गठन किया है महिलाओं की सर्वाङ्गीण विका बोर्ड । काफी विदेशी सहयोग प्राप्त है हमें.....। तुम उसी में रिसेप्सनिस्ट बन जाओ।"

 

निर्मला को लगा था - यही एक देश का बड़ा आदमी है। इतना बड़ा आदमी पहचानकर मेरे यहाँ ले कर आनेवाला मेरा भाई.....। वह हैरान थी। उन आँखों में छिरिङ के रंग-विरंगे सपने बदल चुके थे। रात बहुत हो गई थी और फिर वे दोनो कमरे में ही थे।दोनो अब छिरिङ की जगह ले रहे थे। कभी भाई छिरिङ बनता तो कभी नौकरी देनेवाला वह बहादुर पुरुष। निर्मला को छिरिघ सपने का झीना तार जैसा लगता- जिसमें न कोई स्वर हो न ही कोई आवाज़। इस सत्य को भी उसने स्वीकार कर लिया था। ना-नुकुर करते-करते एक और कहानी लाल रंग में लिखी गई थी। एक महीने की पग़ार एक हजार रूपये बतौर पेशगी उसे मिल चुके थे। वही गाँव का भाई उसका सुख-दुख का साथी बना हुआ था। कुछ ही दिनों में नौकरी का सपना टूट चूका था व अरब जाने का सपना अंकुरित होने लगा था।

"अभी पासपोर्ट बनवाओ। उसके लिए रकम मैं दे रहा हूँ। शौहर ने तुम्हें छोड़ा तो क्या हुआ ? हम लोग मर गए हैं क्या ? हमारा धर्म मर गया है क्या ? अब अरब जओ और ढेर सारे पैसे कमाकर लौटो, निर्मला। ऐसे अनेकन शौहर तुम्हें ढूते हुए आ धमकेंगे।" एक ऊँचा काला दलाल उसे किसी गुप्त कार्यालय में बता रहा था।

"यो बच्चे मैं कहाँ छोड़कर जाऊँ ? फिर वहाँ काम क्या करना है ?" उसने पूछा था

"इन बच्चों को बोर्डिंग में रखना होगा। हर महीने चेक भेज दिया करना काम चल जाएगा। पैसे होंगे तो सब कुछ संभव ह निर्मला ! तुम से आने-जाने भर का किराय लूगा। वह भी अभी मैं ही दिए देता हूँ।" चेहरे से काला मगर देवता समान वह आदमी बोल रहा था।

अपना दे अपने लिए ही वीरान हो गया था। अपना शौहर दुश्मन बन बैठा था। निर्मला ने सारे रूपए जमा करके पासपोर्ट बनवाया था और टिकट का इन्तजार करने लगी थी। नजदीकी बोर्डिंग स्कूल में बच्चों को रखने का इन्तजाम भी कर लिया था उसने।

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"मुझे नींद आ रही है निर्मला ! बिछौना ठीक कर दो।" यह उसके अपने शौहर की आवाज़ थी जो लड़ाई हारकर बहुत थका हुआ लौट पड़ा था तब।

 

वह इस शौहर को चाहकर भी प्यार नहीं कर सकती थी। उसे दहाडे़ मारकर रोने को जी कर रहा था। बते हुए एक महीने के घटनाक्रम फ़िल्म के दृश्यों की तरह उसके दिमाग में चक्कर लगा रहे थे। इन सब को निरर्थक बनाकर वह उठना चाहती थी पर पता नहीं क्यों, नहीं कर पा रही थी। कहीं उसका बदन चिपका हुआ था। वह उठना चाहकर भी नहीं उठ पा रही थी।

 

अरब जाने और पैसे कमाने का सपना भी कुछ दिनों में ही टूट चूका था। टिकट आया कि नहीं यह पता करने को जब गई थी तो न वहाँ विदेश भेजनेवाले का साइनबोर्ड था न रिवाल्वींग चेयर पर बैठनेवाला वह मोटा आदमी। वह ऑफ़िस तो स्पेशल ममो दुकान में बदल चूका था। एक दो दिन के अंतराल में साइनबोर्ड व आदमी को गायब पा कर निर्मला समझ गई थी- आफ़िस तक गायब होनेवाले इस शहर में शौहर का गायब होना एक मामूली सी बात थी। लेकिन दो वक्त की रोटी की समस्या और जटिल बन रही थी। वह क्या कर सकती है ? समाज में पैर कैसे टिका सकती है ? वह बराबर सोचा करती थी। पर दिमाग था एकदम शून्य। हर काम के लिए कुछ रूपए निवेश करने होते थे। उसके पास रूपये तो थे नहीं, नही रूपये उधार देनेवाले सहयोगी थे। उसके पास एक ही रास्ता था- ख़ुद व बच्चों को खत्म कर देना और इस दुनिया से बिदा हो जाना। पर इसके लिए भी निश्चय और साहस नहीं जुटा पाई थी। फिर तो गाँव का भाई और उसके 'सर' लोग ही निर्मला के अपने थे। जैसे भी हो जीते जाना, कमजोर बने पत्थर की तरह।

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"क्यों नहीं बोलती रे ? एक महीने में ही गूगी हो गई क्या ? कह तो दिया आदमी कभी कभार बिगड़ जाता है। मैं भी बिगड़ गया तो क्या आसमान टूट पड़ा ? तू क्यों एकबार मुझे माफ नहीं कर सकती रे ?" छिरिङ की सिर्फ आवाज़ कमरे भर है, और कुछ नहीं। बाहर सड़कों में वाहनों की आवाज़ भी कम हो रही है। शहर सोने की तैयारी में है।

"तुम क्यों लौट आए ?" अनचाहे ही पूछती है वह।

"तेरा और बच्चों का चेहरा यादकर लौट आया हूँ। पुलिसवालों ने कितना पीटा मुझे, सारा बदन बुरी तरह दर्द कर रहा है।" वह हमदर्दी लेना चाह रहा था फिर बात पलटकर बोला - "अपने को नींद सता रही है और तुझे..........।"

"............................................।"

"तू क्यों नहीं बोलती रे ?"

"तुम नहीं लौटते तो अच्छा होता.....मैं बच्चों के साथ जीने के काबिल बन गई थी।"

"और क्या बक रही है रे तू ?"

"तुमने सुना नहीं......."

"मै तो तेरे और इन बच्चों के लिए ही जेल से लौट कर आया हूँ और तू है की अपने को क्या समझ रही है ? हाँ ?" छिरिङ आपा खो रहा है.

"तुम्हारे न होने पर ही मुझे अच्छा होता छिरिङ, कहाँ कैसे जीना हे मैं जान गई हूँ। फिर मुझे क्यों सता रहे हो ?" आहिस्ता से बोलती है निर्मला। वतावरण स्तब्ध है।

"आखिर मैं तेरा शौहर हूँ निर्मला................।" गंभीर बनता है छिरिङ।

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कुमुद अधिकारी

संपादक, हिंदी सरिता

नेपाल

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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