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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-27, अगस्त 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। भाषांतर ।।

 

 

नेपाली कहानी

आख़िर मैं तेरा शौहर हूँ निर्मला


परशु प्रधान / अनुवाद-कुमुद अधिकारी

 

फिर वही कमरा। वही शाम और वही शौहर। वे छोटी व सिकुड़ी आँखें बेढंगा दबी हुई नाक। सूअर जैसे खड़े बाल। दारू पीने से नीनी पड़ी छोटी-छोटी आँखों को लेकर कहता है - "तू अच्छी है निर्मला ?"

 

यह कोई घटना है या दूर्घटना ? सपना है या सच? यथार्थ है या झूठ? वह ख़ुद अपने आपमें सोच रही है- वह कहाँ है? क्यों है? कैसे है? कोई धूमिल-सी यादें तरंगित होने जैसे, कोई सुखद सपना जैसे। वह अपने आप से पूछ रही होती है - 'यह क्या सामनेवाला बौना उसका शौहर है? क्या उससे ही दो बच्चे जनी है? क्या वह इतिहास के विरूपाक्ष जैसा कुरूप नहीं है? क्या वह उसी के सूखे होठों को चुमकर अबतक जी रही है? '

 

उसकी छोटी सी तन्द्रा भंग होती है। वह कठोर स्वर मे पूछ रहा है - "तू क्यों नहीं बोलती रे निर्मला? क्या तू अच्छी है?"

 

वह देखती है-उसकी आखों में पश्चाताप की छोटी-सी चिंगारी तक नहीं है। महीने भर तापता होने पर यह क्या खाएगी, बच्चों को क्या खिलाएगी - कोई वास्ता नहीं।  सूअर की जैसी गुस्सैल आँखें लेकर पूछनेवाले को वह क्या ज़वाब देगी। उससे कुछ भी बोलने को जी नहीं करता। कोई बूरी-सी गाली बक दू-यह भी मन नहीं करता, यह नई बात तो थी नहीं। यह कोई दुर्घटना भी नहीं थी।

 

वह देखती है- यह सपना नहीं सच है। यह महीने के पूरे सात सौ किरायेवाला कमरा है वह भी बग़ैर बिजली व पानी के। हर तीन-चार माह में शौहर की पग़ार को छोड़कर सब बढ़कर आते हैं- बिजली व पानी का किराय, दाल-चावल व तेल के भाव और फिर कमरे का किराया। हर महीने एक तारख को मकान मालिक आकर चेतावनी दे जाता है- किराया ज़्यादा दो नहीं तो कमरा खाली करो। हर छ महीने के सौ-सौ रूपये ज़्यादा देती आई है वह इसी कमरे के लिए, जान की बाजी लगाकर।

 

"क्यों नाक भौं सिकोड़ती है रे? मैं भूखा हूँ। पुलिस की पिटाई से बदन गल चुका है। कुछ गरम-वरम खिला।" यही उसकी शौहर की बोली है जो अफ़सरी अंदाज में फरमा रहा है।

"खाले को कुछ नहीं है।" सूखी आवाज़ में ज़वाब देती है वह।

"लाल चाय तो पिला सकती है?"

"क्यों नहीं बोलती रे? कह तो दिया मुझसे गुस्सा मत कर। जो भी करूँ, हूँ तो तेरा सौहर ही। तेरी दादी द्वारा पैर धो-धो कर बनाया गया जमाई।" उसके आवाज़ में कोई नरमी नहीं है।

"चनी खत्म हुए कई दिन बीत गए।" वह बेमन से बोली।

"तू झूठ बोलती है निर्मला। सुबह चाय के बग़ैर तेरी आँख नहीं खुलती, अबी मुझे पिलाने के लिए चीनी खत्म हो गई, है न?" वह स्पष्टीकरण देने लग जाता है- "क्लास खत्म कर के लौट रहा था। शाम होने को आई थी और फिर वर्षा के लक्षण थे। वह लिफ़्ट मागने लगी। एक जवान लड़की, मुझे दया आ गई। जाना तो थानकोट तक ही लेकिन....। फिर तो...."

 

फिर तो लैंगवेज क्लास लेनेवाली वह चौदह-पंद्रह बरस की लड़की लेकर उसका शौहर वीरगंज पहुँच गया था। निर्मला को क्या मालूम वीरगंज कितना दूर है? किराया कितना लगता है? वह जब हिम्मत करके टिकट लेने बसस्टाप पर पहुँची तो गाँव का दूर के रिश्ते का भा मिला था। वही उससे पूछ बैठा था कि दो-दो बच्चे लेकर वह कहाँ और क्यों जा रही है? पहले पहल वह जवाब देने से इन्कार करने लगी क्योंकि वह नहीं चाहती थी शौहर के भाग जाने की बात इस भाई को मालूम पड़े व थोड़ी-सी इज्जत जो बची थी वह भी चली जाए। परन्तु पलक झपकते ही उसकी इज्जत धूल में मिल गई, जब उसे मालूम हुआ उसके पास वीरगंज  में ठहरने व खाने के लिए तो दूर टिकट के लिए भी पैसे नहीं है।

वह दूर के रिशते का भाई बिलकुल अपने भाई की तरह पूछने लगा था - "वीरगंज क्यों जा रही हो दीदी? वहाँ तुम्हारा कौन है? फिर ये दोनो भांजे भांजिया?"

अस सवाल का ज़वाब निर्मला के पास नहीं था। वह सबके सामने खुल चुकी थी। उसकी आँखों में न चाहते हुए भी आसू भर आए - "काम तो कुछ नहीं...।"

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"फिर तो लड़की तुम्हें पकड़कर वीरगंज ले गई क्यों ?"

"हाँ वही तो, चला तो ता थानकोट पहुचाने लेकिन देखो न पहुँच गए वीरगंज। कैसे पहुँचे? सच कहूँ निर्मला मुझे कुछ महीं मालूम उसकी देह की सुगन्ध ने मुझे बेहोश ही कर दिया था। सचिव की लड़की थी वह। थोड़ी दूर चलें... और थोड़ी दूर ....कहते कहते ......." इसके आगे छिरिह की बोलती बंद हो गई।
पास ही के होटल से एक गर्म चाय आ पहुं
ची है वह भी दूसरे दिन पैसे देने की शर्त में और वह गंभीर मुद्रा में चाय पी रहा है। "मैं भी चाय प मा?" बेटा वातावरण को बोझिल कर देता है। "मैं भी, ......" बेटी उसके ऊपर भार थोपती है।

 

निर्मला की आँखों में, मायके के भाई का साया आ बसता है जो अभी थोड़ी देर बाद इसी कमरे में आ पहुँचेगा, जिसने बसस्टाप से उसे लौटाकर इसी कमरे में ला छोड़ा था और जो थोड़ी-सी जीने की आशा बांटकर गया था।

 

फिर तो दूसरे दिन से ही निर्मला इस महानगर में उसी भाई के साथ नौकरी के लिए दर--दर भटकी थी। शहर की हर गली को उसने नापा था। अपने-पहचाने, अनजाने, नाम सुने-अनसुने लोगों को अपनी दुःख भरी कहानी कह सुनाई थी- " शौहर को गए हुए महना भर होने को है। कुछ अता-पता नहीं है। दो बच्चे हैं। सात-आठ सौ तो कमरे का किराया ही है ऊपर से बिजली-पानी जोड़ने पर तो हजार तो गए ही। साथ में दो पैसे भी नहीं, कोई छोटा मोटा काम...............।"

"छोटा-मोटा जानती हो?"

"नहीं। सिखने का मौका ही नहीं मिला।"

"अँग्रेज़ी बोलना जानती हो?"

"नहीं। बोर्डिंग स्कूल में भी नहीं पढ़ पाई।"

"छोटा-मोटा हिसाब-किताब तो रखती ही होगी?"

"बच्चों की देख-रेख कर सकोगी?"

"बच्चे तो अपने भी हैं..........."

 

कोई छोटे-मोटे काम के सिवा उसके लिए कुछ भी नहीं था। गाँव के साधारण से स्कूल में पाँ-छह जमात पढ़कर आई थी वह। अपने ही स्कूल के मास्टर छिरिङ ने उसे कहाँ आगे पढ़ दिया? पहाड़ों में रेल व मोटर तो थे नहीं, मोटर साईकिलें भी नहीं थी। लेकिन छिरिङ ने रातोंरात बहुत से पहाड़ व नदिया पार करवाकर उसे अपने साथ लाया था और वह इस तरह शहर में आ गई थी। महीने-महीने भर नौकरी ढूढ़ते-ढूढ़ते निर्मता के पैर गल चुके थे, हाथों की ताकत गुम चुकी थी। वह हताश व निराश हो चली थी।

 

गाँव के भाई का ही कमोबे सहारा था। एक रात वही भाई ने उसीके साथ रात का खाना खाया था और बातों-बातों में उसकी आख़िरी बस भी छूट गई थी। वह उसी के कमरे मे सोया था- ठीक वैसे ही जैसे छिरिङ सोता था। उसने वही काम किया जिसका अधिकार सिर्फ छिरिङ को था। वह उस दूर के रिश्ते के भाई को उतनी दूर पैदल चले जाने के लिए भी नहीं कह सकी थी। छिरिङ की छोटी व सिकुड़ी आँखें लम्बी और बड़ी आँखों में बदल गई थीं। सूअर के जैसे कड़े बाल मुलायम और कर्लिङ बन गए थे। यह सब सपने जैसा था- वह आधी रात को आया था उसके कमरे में और मैं ही हूँ छिरिङ क्या फर्क पड़ता है बोला था। वह हाँ भी नही कह सकी और ना भी नहीं कर पाई थी। सपने में एक फूल का पेड़ उखड़ जाने जैसा लगा था, एक तालाब में तैरने जैसा लगा था। कहीं रंग था, कहीं बादल थे, कहीं कुहरा था तो कहीं बाढ़ थी, कहीं प्रलय था। वह होश में थी और बेहोश भी थी।

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