|
ओफ्फ ! ये
फ़ाईलें...
आर.के.भंवर
निश्चित
रूप से
आज़ादी
के बाद इस देश में फ़ाइलों
की फसल अथाह हुई । हर क्षेत्र में फाइलें दौड़ी।
फ़ाईलें
बढ़ी। प्रगति के अनगिनत सोपानों को छूने में इन
फ़ाईलों
का योगदान किसी से छुपा नही है। कभी-कभी
फ़ाईलें
ढाल होती है जो साहब की तलवार रूपी
नज़र
को अपने पर सह लेती है। मजाल भला कि ढाल टूटे,
तलवार की धार भले ही मुड़ जाये।
सरकारी महकमे में यदि आप की
फ़ाईल
कम्पलीट है तो काम का पूरा होना मत समझिये। ये तो पहला चरण है।
फ़ाईल
कम्पलीट होती है,
बड़े बाबू की मेज पर इठला के जाती है। और
बड़े बाबू जब उस पर चिरैया बिठा दे तो ऊपर जाती है। अमूमन
व्यवस्था में ये मान कर चला जाता है कि छोटा और बड़ा बाबू
फ़ाईल
पर लिख पढ़ कर दस्तखत बना दे तो
फ़ाईल
ऊपर से होकर आ ही जाती है,
बशर्ते उस
फ़ाईल
पर भिन्न-भिन्न
मत न निरूपित किये गये हो।
फ़ाईल
का बनना,
सजना, सँवरना
और निकलना ये ऐसे विषय है जो पढ़ाई के दौरान बिहारी की नायिका
के श्रृंगार
वर्णन की याद दिला देती है। स्थानान्तरण के मसले में
फ़ाईलें
काला जादू का तेवर लिये होती है। काला जादू में गायब लड़की की
तरह ये कब गायब हो जाये और शो
ख़तम
होने से पहले कब मिल जाये,
इसे समझना मुश्किल है। कहीं-कहीं
तो
फ़ाईलें
गंडा-ताबीज़
बंधवा कर बढ़ती हैं।
सगुन कराकर बढ़ती है।
786 और ओम लिखा कर चलती है। जैसी जिसकी
श्रध्दा। शार्टकट में कहें तो ये
फ़ाईलें
एनर्जी पाकर चलती है।
फ़ाईलों
का गायब होना अपशकुन माना जाता है। इससे बड़े धत्कर्म हो जाते
है। मसलन गायब
फ़ाईल
के धारक बाबू की शामत। बड़े बाबू और
अफ़सर
द्वारा उसे ब्लैकमेल करने के नायाब रास्तों का अचानक खुल जाना।
ये ऐसे लिख लाये,
वरना वो गायब वाली
फ़ाईल....।
दरअसल
फ़ाईलें
नित्य और शाश्वत होती है और
फ़ाईल
धारक नश्वर।
फ़ाईल
धारक तो कोई हो सकता है पर
फ़ाईलें
वहीं रहेगी।
फ़ाईलों
के चलते रहने से देश चलता है और ये रूक गई तो देश का क्या होगा,
उसके विकास का क्या होगा,
इसलिये कोई सरकार आये वह
फ़ाईलों
को अपने
नज़रिये
या एजेंडा के मुताबिक
तेज़ी,
मध्दिम या धीमी गति से चलवाने में भरोसा
रखती है। संविधान संशोधन हो या पानी विवाद,
पोटा कानून का हटना हो या दागियों का मसला,
अनुपम खेर को हटाना हो या शर्मिला बी की
तैनाती, राज्यपालों की विदाई हो या
रेलवे पर कुल्हणों का चलन....इन सबके वास्ते
फ़ाईलें
ही तो दौड़ी होंगी।
फ़ाईलें गंभीर
मुद्दों पर जब भी
तेज़ी
से दौड़ती है तो आर-पार का परिणाम लेकर लौटती है। ये
सत्ता
पलटने में भूमिका रखती है। देश के वृहत्तर
विकास में
फ़ाईलों
का योगदान शोध का विषय हो सकता है। विश्वविद्यालयी छात्र इस ओर
ध्यान दें
तो सरकार के अनेक विभाग व उनके बाबुओं का सहयोग मिल सकता है।
फ़ाईलें
अपने संवाहकों में भेद नही करती है,
वह बाबू हो सकता है,
अफ़सर
भी हो सकता है। पर
फ़ाईलों
का अनुराग बाबुओं से और बाबुओं का अनुराग
फ़ाईलों
से सर्वविदित है। और हो क्यों न... उनका पोषण व पल्लवन तो वहीं
करता है।
फ़ाईलें
लिखे हुए
काग़ज़ों
के आधार पर बनती है और निर्णय के लिए चलती है। जैसे कोई अर्जी
आई आला
अफ़सर
ने आख्या
माँगी
। आख्या बनकर जब उसके सान्निध्य में आती है तो अर्जी वाला नही
रहता है और अर्जी वाला अपने काम के विषय में उससे पूंछने जाता
है तो वह आख्या नही रहती है।
अफ़सर
देख लेंगे के सिवाय क्या कहेगा
? अनायास ऊपर से
फ़ाईलों
का
माँगना,
फ़ाईलों
का दबाना या उनको छिपाना - ये सभी रहस्य है। हर कड़क
अफ़सर
अपने मातहत से जब ये कहता है - ये देखो तुम्हारी
फ़ाईल
मँगवा
ली है,
तुमने क्या क्या काले सफेद किये है?
सब कुछ
है
इसमें,
बस इतने में ही अगले के प्राण हलक में अटक
गये। कभी कभी कचहरी की तारीख की तरह
फ़ाईलों
पर परिणाम आने का सिलसिला अंतहीन है। जिन
फ़ाईलों
में
'कुछ' होता है
तो वह दौड़ जाती है जिनमें 'कुछ'
नही तो वे सुस्ता सुस्ता कर चलती है। अब तो
सरकारी महकमे का एक सच उभर कर आया है - ऐसे थोड़े ही
फ़ाईलें
बढ़ती है,
वह बढ़वाई जाती है इसके लिए उसके धारक को
'बढ़वाई'
दी जाती है। वह अपना मीटर आन करके सीट पर बैठता है।
आँकड़ों
का संजाल समेटे
फ़ाईलों
का सहोदर सफेदा होता है। ये तीन को पोत कर चार बनाने का एक
ज़रूरी
घोल है। छाया की तरह अनुसरण करता है ये। तरक्कीपसंद समाज के
लोग
फ़ाईलों
के बारे में ज्ञान बढ़ाकर महिमामंडित होते है। पर उनकी महिमा
स्वयं के लिए तो मंडित और अन्य के लिए तनाव परोसने के लिए होती
है। बचने का रास्ता यही है कि व्यक्ति अपने अंदर की
फ़ाईल
खोल ले और उस पर अपने जीवन के उतार चढ़ाव को मन की
आँखों
से लिखता रहे तो बाहर की
फ़ाईल बाहर
ही रह जाती है। पर करे कौन
? किसे बाहर से फुरसत ?
इसीलिये ये
फ़ाईलें.....ऊफ्
और ओफ्फो है। इनका चलना और रूकना कभी ख़ुशी और कभी ग़म जैसा ही
है।
आर.के.भंवर
सूर्य सदन,
सी-501/सी,
इंदिरा नगर,
लखनऊ,
(उ.प्र.)
◙◙◙
|