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आर्थिक
ढाँचा,
लक्ष्य और भाषा
वीरेन्द्र जैन
जीवित
प्राणियों में मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जिसे भाषा की सबसे
अधिक
आवश्यकता
होती है। अन्य प्राणी तो अपनी भूख,
खतरे और सैक्स के लिए बहुत थोड़े से स्वरों
से अपना काम चला लेते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य एक
विकसित सामाजिक प्राणी है और अनेक आयामों पर काम करता है। वह
अपेक्षाकृत अधिक
संवेदनशील
होता है और उसकी उसकी जीवन पद्धति अधिक
संश्लिष्ट
है।
देखा गया है कि जो मानव समुदाय विकास की दौड़ में जितना पीछे
हैं उनकी
शब्द
संपदा उतनी ही कम है और भाषा भी पिछड़ी हुयी है। दूसरी और बहुत
तेज़ी
से विकास के रास्ते पर दौड़ने वाले लोग अनेक भाषाएं सीखने में
भी पीछे नहीं रहते। इससे दो बातें सिद्ध होती हैं,
पहली तो यह कि भाषा का विकास से सीधा
सम्बन्ध है दूसरे आमजन उसी भाषा को सीखने में अधिक रूचि रखते
हैं जो उनके अपने विकास के मापक की ओर पहुंचाने में मददगार
होती है।
पुरातत्वशास्त्री
संस्कृत पाली व प्राकृत सीखते हैं तथा आयुर्वेदिक चिकित्सा
शास्त्र
में उपाधि पाने के इच्छुक लोगों को संस्कृत सीखना होती है।
सत्तर के
दशक
में जब श्रीमती इंदिरा गांधी ने अनेक राजनीतिक कारणों से
बैंकों,
बीमा कम्पनियों और
अनेक दूसरे संस्थानों का राष्ट्रीयकरण किया व इन संस्थानों को
आमजन के लिए खोल दिया तो इन संस्थानों को आम आदमी के साथ
व्यवहार में आना पड़ा। इस व्यवहार को प्रभावी बनाने के लिए
आवश्यक
था कि उक्त संस्थान अपने कामकाज में आम आदमी की भाषा का प्रयोग
करें। ये वही दौर था जब बड़े पैमानेपर इन संस्थानों में हिंदी
अधिकारियों की नियुक्तियाँ
हुयीं और इनके रजिस्टरों व प्रपत्रों में हिन्दी का उपयोग
शुरू
हुआ। नई आर्थिक नीति आने व कम्प्यूटरीकरण के बाद इस सब पर रोक
लग गयी। हिंदी का विरोध करने वाले क्षेत्रो के पर्यटन स्थलों
और तीर्थस्थलों पर सभी दुकानदार व परिवहन वाले लोग बखूबी हिंदी
सीख चुके हैं और व्यवार करते हैं। तामिलनाडु के राजनेताओं को
जब केन्द्रीय सत्ता में भागीदारी मिलने लगती है तब उनका हिंदी
विरोध कम होने लगता है। ठीक से मोलभाव करने के लिए
शुद्ध
खड़ी बोली का स्तेमाल करने वाले सब्जीवालों से क्षेत्रीय बोली
में बोलते देखे जाते हैं। कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि हमारा
आर्थिक
ढाँचा
हमारी भाषा का निर्धारण करता है।
जब मैं जूनियर कक्षाओं का छात्र था तब मुझे संस्कृत और
अँगरेज़ी
भी
आवश्यक
रूप से हिंदी के साथ साथ पढना पड़ती थीं जो उच्चतर माध्यमिक
कक्षाओं तक पढायी जाती रहीं। बाद में विज्ञान का छात्र होने के
कारण मैं
अँगरेज़ी
तो अपनी
ज़रूरत
के हिसाब से सीख गया पर संस्कृत नहीं सीख पाया। पिछले दिनों
कुछ पुराने सहपाठियों से मुलाकात हुयी व बातचीत में संस्कृत के
अध्यापक की चर्चा भी सामने आयी तो मैंने जिज्ञासावश
पूछ लिया कि क्या क्या उनमें से किसी को राम:,
रामौ, रामा: के
रूप याद हैं, तो सब हँसने लगे और
बोले कि वे तो उस समय भी याद नहीं हुये थे तो अब क्या याद
होंगे! उन लोगों को अपने अपने उपयोग वाली हिंदी या
अँगरेज़ी
उसी अनुपात में खूब आती थी। जिन संस्कृत के अध्यापक की छड़ियाँ
हमें पीट पीट कर भी संस्कृत नहीं सिखा सकी थीं वहीं हमारी
आर्थिक
आवश्यकताओं
ने हमें विदेशी
भाषा
अँगरेज़ी
सिखा दी थी। कभी सरकारी कामकाज और अदालतों की प्रमुख भाषा रही
उर्दू आज हिन्दुस्तान में केवल साहित्य के क्षेत्र में ही
अस्तित्व बनाये हुये है और
वहाँ
भी वही साहित्य अधिक लोकप्रिय हो रहा है जो नागरी लिपि में भी
उपलब्ध है।
हमें अपने दैनिंदन जीवन लक्ष्यों को पाने के लिए संवाद की
आवश्यकता होती है व उस संवाद के लिए भाषा की आवश्यकता होती है।
अच्छा संवाद तभी संभव हो सकता है जब हम सम्बोधित करने वाले
व्यक्तिव्यक्तियों को अपना दृष्टिकोण स्पष्ट कर सकने में सफल
हो जाते हैं। इसलिए तय है कि अपनी भाषा को हम अकेले तय नहीं कर
सकते अपितु इसमें उस व्यक्ति की भी भूमिका होती है जिससे हमें
संवाद बनाना होता है। अपना लक्ष्य पाने के लिए हम अपनी भाषा
में आवश्यकतानुसार सुधार करते रहते हैं। चूंकि हमें अधिक लोगों
से व्यवहार करना होता है इसलिए प्रत्येक के अनुरूप किये गये
परिवर्तनों से हमारी भाषा एक नया रूप ग्रहण करती जाती है। ऐसा
प्रत्येक व्यक्ति के साथ होता है पर जब एक जैसा परिवर्तन बड़ा
रूप ले लेता है तो भाषा के नये स्वरूप का जन्म होता है।
सुनिश्चित है कि भाषा समाज में विकास की दिशा के समानुपात में
गति करती है तथा दबाव द्वारा इसमें परिवर्तन की सम्भावनाऐं
बहुत कम होती हैं।
गत दिनों हिन्दी के प्रमुख कवि व आलोचक अशोक वाजपेयी ने
न्यूयार्क में होने वाले विश्व हिंदी सम्मेलन का आमंत्रण
ठुकराते हुये अपने पिछले अनुभवों के आधार पर उसकी निरर्थकता का
वर्णन एक राष्ट्रीय दैनिक में किया था। उनका कहना था कि मैं
इसे व्यर्थ लक्ष्यहीन और फिजूलखर्ची मानता हूँ। इससे हिंदी की
अंर्तराष्ट्रीय प्रतिष्ठा और ख्याति में कोई इज़ाफा नहीं होता।
सम्मेलन पर खर्च की जा रही राशि अगर कुछ प्रमुख विदेशी
विश्वविद्यालयों में हिंदी अध्ययन को सबल करने और वहाँ चेयर्स
आदि स्थापित करने में लगाई जाती तो हिंदी का भला होता और धन का
सदुपयोग भी। अब तक के सम्मेलन हिंदी की बहुलता,
सर्जनात्मकता,
बौद्धिक संपदा और संभावनाओं का सार्थक इज़हार करने में सफल
सिद्ध हुये हैं।
अशोकजी का यह कथन शतप्रतिशत् सही होते हुये भी इसलिए निरर्थक
रहा क्योंकि वे स्वयं ऐसे एक नहीं अपितु अनेक आयोजनों के आयोजक
रह चुके हैं इसलिए ऐसे वक्तव्य देने के तब तक सुपात्र नहीं हो
सकते जब तक कि अपनी भूलों के लिए प्रायश्चित करते हुए यह सब
नहीं लिखते। वैसे केवल इसी मामले में नहीं अपितु एक जैसे किसी
भी दूसरे आयोजन को आयोजित करने से पहले पिछले आयोजन से प्राप्त
की गयी उपलब्धियों का मूल्याँकन अनिवार्य होना चाहिये इससे कम
से कम इतना लाभ तो अवश्य ही होगा कि पिछले आयोजनों में की गयी
त्रुटियों से बचा जा सकेगा। आम तौर पर देखने में आता है कि ऐसे
आयोजन किसी वार्षिक त्योहार की तरह संस्कारों के दबाव में
निबटा लिए जाते हैं व सरकारी प्रतिनिधि मंडल तय करते समय खैरात
की तरह अपनों अपनों वालों में रेवड़ियां बांट दी जाती हैं।
मध्यप्रदेश शासन द्वारा अपना प्रतिनिधिमंडल चुनते समय जिस
अदूरदर्शिता व नंगे पक्षपात का परिचय दिया वह उनके संस्कृति के
क्षेत्र में की गयी अन्य नियुक्तियों से भिन्न नहीं है। वापिस
आने पर इन लोगों से ना तो आयोजन के बारे में कोई रिपोर्ट माँगी
जाती है और ना ही उनके योगदान का मूल्याँकन ही किया जाता है।
दुर्भाग्य यह है कि आयोजकों को यह भी पता नहीं होता कि यह
आयोजन भाषा का आयोजन है साहित्य का नहीं और इसमें साहित्यकारों
की जगह
भाषाशास्त्रियों
का अधिक महत्व है।
भाषा के जड़त्व का दुराग्रह भी किसी भी तरह के दूसरे जड़त्वों के
दुराग्रहों से भिन्न नहीं होता है। जब कबीर दास ने कहा था
कि-संस्कृत है कूप जल भाषा बहता नीर- तब वे किसी भाषा या लिपि
के प्रति पक्षधरता न करते हुये ऐसी पक्षधरताओं को ठुकरा रहे
थे। भाषा के लोकतंत्र की सबसे बड़ी ज़रूरत यह है कि व्यक्ति
अपनी भाषा में अपनी बात कह सकने में स्वतंत्र हों। तुलसीदास ने
अपने रामचरित मानस को जनभाषा में लिखते समय देवभाषा में ही
प्रभु चरित्र लिखे जाने की सीमा बाँधने वाले पुरोहितों से
लम्बा संघर्ष किया था। वे व्यक्ति की भाषायी स्वतंत्रता के लिए
लड़ने वाले योद्धा की तरह भी याद किये जाने चाहिये।
वीरेन्द्र जैन
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शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल
(मप्र)
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