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सृजनगाथा

 

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वर्ष-2, अंक-23, अप्रैल, 2008

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।। पुस्तकायन ।।

 

 

किस्सागोई और मनोविज्ञान का ख़ूबसूरत मिश्रण


ज़कीया जुबैरी

 

बेर आँखें तेजेन्द्र शर्मा का पाँचवाँ कहानी संग्रह है, जिसमें उनकी बारह कहानियाँ एवं कहानी प्रक्रिया पर लेख शामिल हैं। पिछले ही वर्ष इस कहानी संग्रह का विमोचन दिल्ली के सिरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम में हिन्दी दिवस के अवसर पर डा।गोपीचन्द नारंग की उपस्थिति में हुआ। तेजेन्द्र शर्मा समकालीन हिन्दी कहानी के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं।

 

बेघर आँखें में तेजेन्द्र शर्मा की कहानी क़ब्र का मुनाफ़ा शामिल है जिसे साक्षात्कार के संपादक हरि भटनागर ने इंडिया टुडे के एक सर्वे में पिछले 60 वर्षों के बीस महत्वपूर्ण कहानियों में शामिल किया है। इस कहानी का विषय अछूता है और निर्वाह बेबाक। हिन्दी कहानियों में आमतौर पर मुसलमान चरित्र बहुत कम दिखाई देते हैं। यदि होते भी हैं तो एक टाईप के तौर पर उपस्थित रहते हैं। वे हाड़ मांस के नहीं दिखाई देते। क़ब्र का मुनाफ़ा इस मामले में एक ख़ास कहानी कही जा सकती है - जहाँ  नजम जमाल, ख़लील ज़ैदी, नादिरा और आबिदा जैसे प्रवासी मुसलमान चरित्रों का चित्रण बहुत गहराई से किया गया है। कहानी की भाषा व्यंग्य का पुट लिये है और इसके विज़ुअल्स करीब-करीब थ्री-डायमेन्शनल हैं। कहानी का विषय एकदम अछूता है। यह तेजेन्द्र की अधिकतर कहानियों के बारे में कहा जा सकता है कि वे हिन्दी कहानी विधा को अपनी हर कहानी के माध्यम से एक नई दुनिया में ले जाते हैं। उस नई दुनिया को वे चमत्कारी नहीं बनाते बल्कि वहाँ सच्चाई का ठोस धरातल पैदा करते हैं। क़ब्रें ख़रीद कर बेचने से मुनाफ़ा कमाने का आइडिया बिल्कुल नया है। कब्रिस्तान द्वारा पेश की गयी नई स्कीम नजम को बहुत पसन्द आती है, " ख़लील भाई, उनकी एक बात बहुत पसन्द आई है। उनका कहना है कि अगर आप किसी एक्सीडेन्ट या हादसे का शिकार हो जाएं, जैसे आग से जल मरें तो वो लाश का ऐसा मेकअप करेंगे कि लाश एकदम जवान और ख़ूबसूरत दिखाई दे। अब लोग तो लाश की आख़री शक्ल ही याद रखेंगे न। नादिरा भाभी और आबिदा को यही आइडिया बेचते हैं, कि जब वो मरेंगी तो दुल्हन की तरह सजाई जायेंगी।"

 

बेघर आँखें एक ऐसे प्रवासी की कहानी है जो मुंबई में अपने फ़्लैट को किराए पर चढ़ाता है और फिर किरायेदार की चालों से परेशान होता फिरता है। यहां तक तो कहानी सीधी चाल चलती दिखाई देती है। अचानक कहानी का क़द बड़ा हो जाता है जब किरायेदार की नवविवाहिता पत्नी की आंखों में कहानी के मुख्य पात्र को अपनी मरहूम पत्नी की आँखें दिखाई देने लगती हैं और उसे किरायेदार को घर से निकाल कर ऐसा महसूस होता है जैसे उसने अपनी मरहूम पत्नी को एक बार फिर बेघर कर दिया है। इस कहानी में मराठी, पंजाबी और  मुंबइया हिन्दी का बहुत ख़ूबसूरत उपयोग किया गया है।

 

एक बार फिर होली थीम के मामले में बहुत ही ख़ूबसूरत कहानी है। यह एक ऐसी भारतीय मुसलमान लड़की की कहानी है, जिसे एक हिन्दु लड़के से प्रेम करने के जुर्म में उसके परिवार वाले देश निकाला दे कर कराची में एक फ़ौजी से शादी कर देते हैं। उस भारतीय मुसलमान लड़की को मुस्लिम बाहुल्य वाले पाकिस्तान में अपने आप को एडजस्ट करने में कितनी कठिनाई होती है यही इस कहानी का मर्म है। हम आम तौर पर मुसलमानों को एक जमात के तौर पर मान लेते हैं। इस कहानी में नजमा एक इन्सान है जिसे अपने माहौल से दूसरे माहौल पर जाने में परेशानिय़ों का सामना करना पड़ता है।  जब नजमा मोहन जोदड़ो और हड़प्पा के बारे में पूछ बैठती है तो उसे अपने पति से जवाब मिलता है, ''क्यों नजमा साहिबा क्या आपके हिन्दुस्तान वाले मोहन जोदड़ों और हड़प्पा को भी कश्मीर की तरह हडप जाना चाहते हैं? उनको कहना कि यहां तो तक्षशिला भी है उनका बस चलता तो उसे भी बांध कर अपने साथ ले जाते... "कराची में जब उसका भारतीय पासपोर्ट फाड़ कर पाकिस्तानी पासपोर्ट बनवा लिया जाता है तो नजमा महसूस करती है "इस शहर में, इस देश में, वह कितनी बार आहत हुई है कितनी बार उसने उस मौत को गले लगाया है जिसमें इन्सान का शरीर तो नहीं मरता लेकिन आत्मा कई कई मौतें मर जाती है आज भी वह छलनी हुई आत्मा को अपने इस शरीर में ढो रही है जिसमें अपने ही ऊपर चढ़ाए गये कपड़ों को उठाने की ताकत नहीं"

 

अभिशप्त एक ऐसे भारतीय युवक रजनीकांत की दर्दगाथा है जो कि अपने परिवार के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने के लिये लन्दन आता है और अपने से तीन वर्ष बड़ी निशा से विवाह कर लेता है। यह कहानी रजनीकांत जैसे हर उस युवक की कहानी बन जाती है जो विदेशों में संघर्ष कर रहे हैं। कहानी के अन्त में जैसे रजनीकांत की सोच लेखक तेजेन्द्र शर्मा की सोच के साथ एक हो जाती है, "रजनीकांत, तुम कुछ नहीं करोगे, तो तुम अपनी पत्नी को छोड़ोगे और यह देश - तुम और तुम्हारे दोस्त यह जीवन जीने के लिए अभिशप्त हो...अपनी-अपनी पत्नियों के साथ रहना तुम्हारी नियति बन गया है, तुम चाहकर भी इस जीवन की सुविधाओं को छोड़ नहीं सकते। तुम उन लोगों में से हो जो रोज़ शाम को शराब के गिलास पर सवार होकर अपने देश वापस चले जाते हैं और सुबह होते ही जब नशा उतर जाता है ठंडी रोटी खाकर वेयर-हाउस पहुँच जाते हैं। गाँव और मुल्क, अब सिर्फ़ तुम्हारे ख़यालों में रह सकते हैं। तुम्हारी वापसी अब मुमकिन नहीं। तुम्हें यहीं जीना है और एक दिन मर भी जाना है। "

 

मुझे मार डाल बेटा... ! एक दिल को छू जाने वाली कहानी है। इस कहानी में पुत्र अपने लकवाग्रस्त पिता के आग्रह के बावजूद उनको उपहार-स्वरूप मौत नहीं दे पाता वहीं अपने अजन्मे बच्चों के लिये एकदम मृत्यु स्वीकार कर लेता है जब डाक्टर बताते हैं कि ये बच्चे सामान्य स्वस्थ जीवन नहीं बिता पायेंगे। कहानी के अन्त में वह इस प्रश्न से जूझता दिखाई देता है " मेरे मन में एक विचित्र सा अपराध बोध घर करने लगा था। मैं पांच वर्ष तक अपने बाऊजी को नरक में घिसटता देखता रहा, उनकी मुक्ति के लिये कुछ नहीं कर पाया किन्तु अपने उन पुत्रों के लिये मैंने इतनी जल्दी निर्णय कैसे ले लिया। क्या मैं अपने बाऊजी को अपने अजन्में पुत्रों से कम प्यार करता था? "

 

मेरी सबसे अधिक प्रिय हिन्दी कहानियों में शामिल है पासपोर्ट का रंग । इस कहानी के मुख्य किरदार बाऊजी की पीड़ा जैसे मेरी अपनी पीड़ा बन गयी। जब मुझे अपना पासपोर्ट त्याग कर दूसरे मुल्क का पासपोर्ट बनवाना पड़ा था तो मेरी हालत भी बहुत कुछ बाऊजी जैसी थी। इस कहानी की एक ख़ासियत यह भी लगी कि इस कहानी में कोई विलेन या वैंप नहीं है। बस हालात ही ऐसे हैं जो बाऊजी की परेशानियों का सबब बन जाते हैं। गोपाल दास जी जब पहली बार भारत के लिये वीज़ा अप्लाई करने जाते हैं तो तेजेन्द्र शर्मा उनकी मनःस्थिति का बहुत ही ख़ूबसूरत चित्रण करते हैं। "गोपाल दास जी पहली बार भारत के लिए वीज़ा लेने जा रहे थे। बहुत शर्म आ रही थी। सुबह नाश्ते के समय इंद्रेश की ओर देखा, 'पुत्तर जी, क्या तुम त्रिलोक को कह कर मेरे लिए वीज़ा नहीं लगवा सकते। भारत के लिए वीज़ा अप्लाई करने में बहुत अजीब सा लग रहा है।" यह कहानी भारत सरकार के रवैये की भी कड़ी पड़ताल करती है जो बातें तो बहुत करती है लेकिन, झूठे सपने बहुत दिखाती है किन्तु अपना वादा निभाती नहीं।

 

तेजेन्द्र शर्मा ने लन्दन में एक मुहिम चला रखी है कि प्रवासी लेखकों की कहानियों में उनके अपनाए गये देश का वातावरण, थीम और घटनाएं अवश्य चित्रित की जाना चाहियें। कथा गोष्ठियों, विभिन्न आयोजनों एवं कवि सम्मेलनों में तेजेन्द्र अपनी इस बात को दोहराने में कतई ग़ुरेज़ नहीं करते। तेजेन्द्र अपनी बात केवल कहते ही नहीं, बल्कि उस पर स्वयं अमल भी करते हैं।  इस संग्रह की बारह कहानियों में से ग्यारह कहानियों के थीम एवं वातावरण उनके अपनाए हुए देश के प्रवासियों के जीवन से जुड़े हैं। कब्र का मुनाफ़ा, मुझे मार डाल बेटा.. !, कोख का किराया, अभिशप्त, एक बार फिर होली, ये क्या हो गया...!, टेलिफ़ोन लाईन, छूटता फिसलता जीवन, पापा की सज़ा, पासपोर्ट का रंग एवं बेघर आँखें अपने पाठकों को एक नई दुनियां से परिचय करवाती हैं।

 

कोख का किराया सरोगेट मदर के थीम को एक नये कोण से देखती है। दो बच्चों की मां मन्दीप का चरित्र हिन्दी कथा संसार का एक अनूठा चरित्र है, जो अपने प्रिय फ़ुटबॉल खिलाड़ी बीफ़ी डेविड के बच्चे के लिये अपनी कोख किराये पर देने को तत्पर है। वह प्रकृतिक तरीके से गर्भ धारण करना चाहती है, अपने पति की परवाह नहीं करती है और अपने बसे बसाए घर को उजाड़ बैठती है।

 

तेजेन्द्र के चरित्र जीवन्त होते हैं और उऩकी समस्याएं जीवन से जुड़ी। अभिशप्त का रजनीकांत, एक बार फिर होली की नजमा, ये क्या हो गया कि अनुष्ठा, पासपोर्ट का रंग के बाऊजी, टेलिफ़ोन लाइन का अवतार दिलो-दिमाग़ पर इस तरह छा जाते हैं कि भुलाए नहीं भूलते। उनकी कहानियों को पढ़ते हुए अन्त का अन्दाज़ कभी नहीं होता। वे कहानी के अन्त में कुछ ऐसा नया मोड़ दे जाते हैं जो कि कहानी के अर्थ बदल देता है। तेजेन्द्र शर्मा की कहानियाँ शुरू करना पाठक के हाथ में होता है किन्तु एक बार शुरू कर देने के बाद छोड़ पाना संभव नहीं होता। पठनीयता तेजेन्द्र की कहा