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बारीक रेखाओं का कलाकार
हरिप्रकाश वत्स
टॉल्सटॉय
ने कला के विषय में लिखा है –
“कला
हमारे जीवन की चेतन अभिव्यक्ति है। हम कलाकृति में अपना
प्रतिबिम्ब देखते हैं, समाज का प्रतिबिम्ब देखते हैं। यह
प्रतिबिम्ब समाज का होता है। कलाकार का उद्देश्य होता है -
अपने भोगे हुये यथार्थ को प्रतिबिम्बित कर उसमें विश्व की
अनुभूति से साद्दश्य कराना।”
वास्तव में एक कलाकार ऐसा शिव-स्वरुप है जो संसार का विष स्वयं
पीकर जनमानस पर अमृत की बौछार करता है। एक कलाकार अपनी कला के
माध्यम द्वारा जीवन को पूर्णता प्रदान करता है। सर हरबर्ट रीड
अपनी पुस्तक ‘फिलोस्की
ऑफ माडर्न आर्ट’
में कहते हैं कि आधुनिक कला
‘इलेस्ट्रेशन’
नहीं वरन् ‘इन्टर
प्रेटेशन’
है (‘प्रतिमा’
नहीं ‘प्रतीक’है)
। साधारण मानव कलाकार की अभिव्यक्ति की गहराईयों में झाँकने का
प्रयास नहीं करता क्योंकि यह अभिव्यक्ति का अमूर्त रूप है जो
प्रतीक रुप में होता है और इसीलिये उसकी पहुँच के बाहर हो जाता
है।
रंगो के संसार का सम्प्रेषण अपेक्षाकृत सहजता से होने के कारण
पेंटिंग्स को सामान्य कला प्रेमी भी याद रख पाते है जबकि
रेखांकनों की सम्प्रेषणीयता के लिये दर्शन की कला की समझ आडे
आती है। इसकी सबसे बड़ी बाधा अमूर्तन की है। रेखांकन कला में
अमूर्तन के शिल्प को अपनी दृष्टि से नवीन आयामों एवं प्रयोगों
से सम्पन्न तथा समृद्ध करने वाले तथा निरंतर सृजन, सक्रियता
द्वारा मूर्त और अमूर्त और के समुच्चय से संप्रेषण की माँग
पूरी करने वाले छत्तीसगढ़ प्रदेश के विख्यात ललित चित्रकार हैं
- श्री कृष्ण कुमार ‘अजनबी’
जो देवभोग जैसे सुदूर अंचल में निवासरत हैं तथा अपनी
रेखांकन-कला की “मेरी
बोलती तस्वीरें”
का ‘गुलदस्ता’
भेंट स्वरूप लेकर समाज के समक्ष उपस्थित हुये हैं, जिसके
फलस्वरुप वे अब एक ‘अजनबी’
न रहकर सर्वपरिचित हस्ताक्षर बन चुके हैं। यही उनके जीवन तथा
कला जगत् की महती उपलब्धि है।
अपनी स्थूल रेखाओं में जीवन की सूक्ष्मता को चित्रित करता यह
चित्रकार अपनी कलाधर्मिता के पथ पर अपना रेखा-दर्शन साथ लिये
चल रहा है, जिसमें समसामियकता के साथ समाज की विषय वस्तु,
उसमें फैली विसंगतियाँ एवं विषमतायें प्रतिबिम्बित होते
दृष्टिगत होती हैं। वास्तव में सूक्ष्म रेखांकन को उसके पूर्ण
अर्थ के साथ समझना एक अत्यंत कठिन कार्य है। स्वयं कलाकार भी
अपने चित्रों का आधार एवं हेतु नहीं समझ पाता । इसी तथ्य को
स्वयं कृष्ण कुमार ‘अजनबी’
भी स्वीकारते हैं क्योंकि उन्हें भी स्वयं अपने रेखा-दर्शन की
मूक भाषा का पता नहीं है।
“मेरी
बोलती तस्वीरें”
के रेखाचित्रों पर दृष्टिपात करने पर जो तथ्य उभरते हैं वे
चित्रकार के रेखांकनों के दर्शन को स्वयं प्रतिबिम्बित करते
चलते हैं जैसे-
0 जीवन के यथार्थ की आग और राग का समन्वय।
0 मछली, चिड़िया, पेड, घर, मानव आकृतियों का चित्रण जो जीवन से
जुड़े सभी तत्वों को विश्लेषित करने का उपक्रम है।
0
तपते सूरज की ओर मनुष्य के बढ़ते हाथ उसे पकड़ने का एक प्रयास
है। जो मानव के संघर्ष का प्रतीक है।
0
स्त्री के चेहरे को ढकता मकड़ी का जाला उसके जीवन की जटिलताओं
का प्रतीक है।
0 मानव का खाली चेहरा-जैसे सभी चेहरों की कल्पना का एक बिम्ब।
0 वृक्ष, जड़े, पत्तियाँ, पृथ्वी, वनस्पत्तियां चित्रकार के
जहाँ प्रकृति प्रेम को दर्शाती है वहीं उसकी पर्यावरण की
चिन्ता को भी प्रतिबिम्बित करती है।
0 प्रेम, ईष्या, द्वेष, संघर्ष, घृणा, तृष्णा, आक्रोश, तनाव,
दवाव तथा जीवन की सभी जटिलताओं को प्रदर्शित करते प्रतीक।
0 नारी के सम्पूर्ण जीवन से जड़ते तत्वों का बिम्बन।
0 समसामयिकता को रेखांकित करते अनेक चित्र।
0 निराशाओं, कुण्ठाओं, विफलताओं तथा पीड़ाओं को दर्शाते
रेखाचित्र।
0 जीवन की समग्रता को विश्लेषित करते रेखांकन-बिम्ब।
0 जीवन के अध्यात्म की ओर उन्मुख करती रेखायें।
“मेरी
बोलती तस्वीरें”
का ‘गुलदस्ता’
वास्तव में ही एक ऐसा
‘पुष्प-गुच्छ’
है जिसकी महक रेखाओं में रच-बसकर मन-मस्तिष्क में सीधे उतरती
चली जाती है। श्री ‘अजनबी’
एक ऐसे मौलिक चित्रकार हैं जिनकी तूलिका में जीवन के
अंतर्द्वन्द्व को उनकी समसामयिकता के साथ कई शैलियों में
अभिव्यक्त करने की क्षमता है। रेखाओं से लेकर बिन्दुओं तक और
काले सघन रंगों के फैलाव से लेकर उसकी सघनता तक कई माध्यमों का
वे प्रयोग करते हैं । उनके चित्र यथार्थ की आग और राग दोनों का
सुन्दर संयोजन प्रस्तुत करते हैं। श्री
‘अजनबी’
के चित्रों की विशिष्टता है उनकी मौलिकता । तथापि कहीं-कहीं
रेखांकनों पर ‘प्रभाकर
जी’
के विशिष्ट शैली का प्रभाव भी देखने को मिलता है। फिर भी इनके
सभी चित्र उनकी एकाग्रता, तन्मयता तथा मौलिकता की छाप छोड़ते
चलते हैं।
श्री अजनबी के चित्र विधान में चित्र कला की सूझबूझ, कमनीयता,
भाव प्रधानता, नवचिन्तन, गति,लोच, तथा आलंकारिक सौंदर्य की झलक
स्पष्टतः देखी जा सकती है। यही उनके कला अनुशासन को प्रमाणित
भी करती है। वे रेखाओं में ज़िंदगी की खोज करते ऐसे रुपंकर
कलाकार हैं, जो नव जागरण का शंखनाद करते हैं। उनकी उत्कृष्ट
सृजनात्मकता प्रणम्य है।
हरिप्रकाश वत्स
सी-3, नीलांचल
विहार, शंकरनगर
रायपुर,
छत्तीसगढ़ - 492007
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