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हिमालय अदृश्य हो गया
महावीर शर्मा
सोमवार 11 सितम्बर, 1893। अमेरिका स्थित शिकागो में विश्व धर्म
सम्मेलन में गुरुए वस्त्र धारण किये हुए एक 30 वर्षीय भारतीय
सन्यासी ने, जिसके हाथ में भाषण के लिए न कोई काग़ज़ था, ना
कोई पुस्तक, चार शब्दों
“अमेरिका
निवासी बहनो और भाईयो”
से श्रोताओं को संबोधित कर चकित कर डाला। 7000 हज़ार श्रोताओं
की 14,000 तालियों से 3 मिनट तक चारों दिशाएं गूँजती रहीं ।
अमेरिका निवासी सदैव केवल
“लैडीज़
एंड जैंटिलमैन”
जैसे शब्दों से ही संबोधित किये जाते थे ।
यह थे स्वामी
विवेकानंद जिन्होंने अपने व्याख्यान में भारतीय आध्यात्मिक
तत्वनिरूपण कर
जन-समूह एवं विभिन्न धर्मों के ज्ञान-विद प्रतिनिधियों के मन
को मोह लिया
था। अंतिम अधिवेशन में वक्ताओं,
विभिन्न देशों और धर्मों के प्रतिनिधियों और
श्रोताओं का धन्यवाद देते हुए जिस प्रकार प्रभावशाली भाषण को
समाप्त किया,
लोग आनंद-विभोर हो उठे। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदू-धर्म केवल
सार्वभौमिक
सहिष्णुता में ही नहीं,
अपितु इस में भी विश्वास करता है कि समस्त धर्म
सत्य और यथा-तथ्यों पर आधारित हैं।
000
लगभग नौ वर्ष
पश्चात
शुक्रवार,
४ जुलाई १९०२ के दिन अमेरिका-निवासी १८५वाँ
स्वतंत्रता-दिवस धूम-धाम से मनाते हुए २ लाख व्यक्ति
शैनले-पार्क,
पिट्सबर्ग में राष्ट्रपति रूज़वेल्ट का भाषण सुन रहे थे,
उसी दिन जिस
सन्यासी स्वामी विवेकानंद ने ११ सितंबर १८९३ में अमेरिका में
ज्ञान-दीप
जला कर सत्य के प्रकाश से लोगों के हृदयों को आलोकित किया था,
भारत के पश्चिमी बंगाल के कोलकात्ता नगर के समीप हावड़ा
क्षेत्र में
हुगली नदी के दूसरे तीर पर स्थित बेलूर मठ में सूर्यास्त के
साथ साथ
स्वामी विवेकानंद सदैव के लिए नश्वर शरीर त्याग कर
'महा-समाधि'
लेकर
महा-प्रयाण की ओर अग्रसर थे।
स्वामी विवेकानंद प्रातः ही उठ गए थे। साढ़े आठ बजे मंदिर में
जाकर
ध्यान-रत हो गए। एक घण्टे के पश्चात एक शिष्य को कमरे के सारे
द्वार और
खिड़कियाँ बंद करने को कह कर लगभग डेढ़ घण्टे उस बंद कक्ष में
भीतर ही
रहे। लगभग डेढ़ घण्टे बाद माँ काली के भजन गाते हुए नीचे आ गए।
स्वामी जी
स्वयं ही धीमी आवाज़ में कुछ कह रहे थेः "यदि एक अन्य
विवेकानंद होता तो वह
ही समझ पाता कि विवेकानंद ने क्या किया है। अभी आगामी समय में
कितने
विवेकानंद जन्म लेंगे।" पास में ही स्वामी प्रेमानंद इन शब्दों
को सुन कर
स्तब्ध से रह गए। भोजन के पश्चात स्वामी जी प्रतिदिन की भाँति
ब्रह्मचारियों को ३ घण्टे तक संस्कृत-व्याकरण सिखाते रहे।
आज स्वामी
जी के चेहरे पर किसी गंभीर चिंता के लक्षण प्रगट हो रहे थे।
अन्य स्वामी
तथा शिष्यगण देखकर भी उनसे पूछ ना सके। सांय ४ बजे एक अन्य
स्वामी के साथ
पैदल ही घूमने चले गए। लगभग १ मील चल कर वापस मठ पर चले आए।
ऊपर,
अपने
कक्ष में जाकर अपनी जप-माला मँगवाई। एक ब्रह्मचारी को बाहर
प्रतीक्षा करने
के लिए कह कर ध्यानस्थ हो गए। पौने आठ बजे एक ब्रह्मचारी को
बुलाकर कमरे के
दरवाज़े और खिड़कियाँ खुलवा कर फ़र्श पर अपने बिस्तर पर लेट
गए। शिष्य
पंखा झलते हुए स्वामी जी के पाँव दबाता रहा।
दो घण्टे के पश्चात स्वामी
जी का हाथ थोड़ा सा हिला,
एक हलकी-सी चीख़ के साथ एक दीर्घ-श्वास! सिर
तकिये से लुढ़क गया- एक और गहरा श्वास !! भृकुटियों के बीच
आँखें स्थिर हो
गईं। एक दिव्य-ज्योति सब के हृदयों को प्रकाशित कर,
नश्वर शरीर छोड़ कर
लुप्त हो गई। शिष्य उनकी शिथिल स्थिर मुखाकृति देख कर डर सा
गया। बोझल
हृदय के साथ दौड़ कर नीचे एक अन्य स्वामी को हड़बड़ाते हुए
बताया। स्वामी
ने समझा कि स्वामी विवेकानंद समाधि में रत हो गए हैं। उनके
कानों में श्री
राम कृष्ण परमहंस का नाम बार बार उच्चारण किया,
किंतु स्वामी जी का शरीर
शिथिल और स्थिर ही रहा,
उसमें कोई गति का चिन्ह नहीं दिखाई दिया।
कुछ
ही क्षणों में डॉक्टर महोदय आगए। जिस सन्यासी ने अनेक
व्यक्तियों के
हृदयों में दैवी-श्वास देकर जीवन का रहस्य बता कर अर्थ-पूर्ण
जीवन-दान
दिया,
आज उस भव्यात्मा के शरीर में डॉक्टर की कृत्रिम-श्वासोच्छवास
में
गति नहीं दे सकी। स्वामी विवेकानंद ३९ वर्ष,
५ मास और २४ दिनों के अल्प
जीवन-काल में अन्य-धर्मान्ध व्यक्तियों द्वारा हिंदू-धर्म के
विकृत-रूप के
प्रचार से प्रभावित गुमराह लोगों को हिंदू-धर्म का यथार्थ मर्म
सिखाते रहे।
स्वामी ब्रह्मानंद स्वामी जी के गतिहीन शरीर से लिपट गए। एक
अबोध बालक की
तरह फफक-फफक कर रो पड़े। उनके मुख से स्वतः ही निकल पड़ा-
"हिमालय
अदृष्य हो गया है!"
प्रातः स्वामी जी के नेत्र रक्तिम थे और नाक,
मुख से हल्का-सा रक्त निकला हुआ था।
तीन दिन पहले २ जुलाई को स्वामी जी ने निवेदिता को दो बार
आशीर्वाद
देकर आध्यात्मिकता का सत्य-रूप दिखाया था और आज वह उसी
दिव्य-ज्योति में
समाधिस्थ थी। कक्ष के दरवाजे पर थपक सुन कर ध्यानस्थ निवेदिता
ने आँखें
खोली और द्वार खोल दिया। एक ब्रह्मचारी सामने खड़ा हुआ था,
आँखों में
अश्रु निकल रहे थे। भर्राये हुए स्वर से बोला,
"स्वामी
जी रात के समय......."
कहते कहते उसका गला रुंध गया,
पूरी बात ना कह पाया। निवेदिता स्तब्ध-सी
शून्य में देखती रह गई जैसे अंग-घात हो गया हो। जिव्ह्या बोलने
की चेष्टा
करने का प्रयास करते हुए भी निश्चल रही। फिर स्वयं को संभाला
और मठ की ओर
चल दी।
स्वामी जी के शरीर को गोद में रख लिया। दृष्टि उनके शरीर पर
स्थिर हो गई,
पंखे से हवा देने लगी और उन्माद की सी अवस्था में वो समस्त
सुखद घटनाएं दोहराने लगी जब स्वामी जी ने इंग्लैंड की धरती से
निवेदिता को
भारत की परम-पावन धरती में लाकर एक नया सार्थक जीवन दिया था।
मृत-शरीर
नीचे लाया गया। भगवा वस्त्र पहना कर सुगंधित पुष्पों से सजा कर
शुद्ध-
वातावरण को बनाए रखने के लिए अगर बत्तियाँ जलाई गईं। शंख-नाद
से चारों
दिशाएं गूँज उठी। लोगों का एक विशाल समूह उस सिंह को
श्रद्धाञ्जली देने के
लिए एकत्रित हो गया। शिष्य,
ब्रह्मचारी,
अन्य स्वामी-गण,
और सभी उपस्थित
लोगों की आँखें अश्रु-भार संभालने में अक्षम थे। निवेदिता एक
निरीह बालिका
की भांति दहाड़-दहाड़ कर रो रही थी। उसने स्वामी जी के कपड़े
को देखा और
विषादपूर्ण दृष्टि लिए स्वामी सदानंद से पूछा,
"क्या
यह वस्त्र भी जल
जाएगा ?
यह वही वस्त्र है जब मैंने उन्हें अंतिम बार पहने हुए देखा था।
क्या मैं इसे ले सकती हूँ
? "
स्वामी सदानंद ने कुछ क्षणों के लिए आँखें मूँद ली,
और तत्पश्चात बोले,
"निवेदिता,
तुम ले सकती
हो। "
निवेदिता सहम सी गई,
ऐसा कैसे हो सकता था?
वह यह वस्त्र एक याद के रूप
में जोज़फ़ीन को देना चाहती थी। उसने वस्त्र नहीं लिया।
चमत्कार था या संयोग- कौन जाने
?
निवेदिता को जिस वस्त्र को लेने की इच्छा थी,
जलती हुई चिता से उसी
वस्त्र का एक छोटा-सा टुकड़ा हवा से उड़कर उसके पाँव के पास
आकर गिर पड़ा।
वस्त्र को देख,
वह विस्मित हो गई। छोटे से टुकड़े को श्रद्धापूर्वक बार
बार मस्तक पर लगाया। उसने यह स्वमी जी का दिया हुआ अंतिम उपहार
जोज़फ़ीन
के पास भेज दिया जिसने दीर्घ काल तक उसे संजोए रखा।
उस चिता की
अग्नि-शिखा आज भी स्वामी जी के अनुपम कार्यों में निहित,
विश्व में भारतीय
अंतश्चेतना,
अंतर्भावनाशीलता और सदसद् विवेक का संदेश दे,
भटके हुए को राह
दिखा रही है!
“ईश्वर
को केवल मंदिरों में ही देखने वाले व्यक्तियों
की अपेक्षा ईश्वर उन लोगों से अधिक प्रसन्न होते हैं जो जाति,
प्रजाति,
रंग,
धर्म,
मत,
देश-विदेश पर ध्यान ना देकर निर्धन,
निर्बल और रोगियों की
सहायता करने में तत्पर रहते हैं। यही वास्तविक ईश्वर-उपासना
है। जो
व्यक्ति ईश्वर का रूप केवल प्रतिमा में ही देखता है,
उसकी उपासना
प्रारंभिक एवं प्रास्ताविक उपासना है। मानव-हृदय ही ईश्वर का
सब से बड़ा
मंदिर है।”
महावीर
शर्मा
7 Hall Street
London
N12 8DB, U.K.
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