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एक पत्र बेटी के नाम
महावीर शर्मा
लन्दन
१५
अप्रैल,
२००५
मेरी
प्यारी
बेटी
मेरे
इस
पत्र
की
तिथि
देख
कर
तुम
सोचती
होगी
कि
इससे
दो
दिन
पहले
ही
तो
फ़ोन
पर
बात
हुई
थी,फिर
यह
पत्र
क्यों?…
बेटी,
इस
पत्र
में
जो
कुछ
लिख
रहा
हूँ,
वह
फोन
पर
सम्भव
नहीं
था।
इस
पत्र
की
प्रेरणा
मुझे
दो
बातों
से
मिली।
सुबह
सड़क
पर
गिरे
कुछ
काग़ज़
मिले
जिन
में
किसी
पिता
के
मर्म-स्पर्शी
उद्गार
भरे
थे।
ऐसा
लगा
जैसे
कि
उसकी
आत्मा
उन्हीं
काग़ज़ों
के
पुलिंदे
के
इर्द-गिर्द
भटक
रही
हो।
दूसरे,
स्वः
पं०
नरेन्द्र
शर्मा
की
इन
पंक्तियों
को
पढ़
कर
ह्रदय
विह्वल
हो उठा:
‘सत्य
हो यदि,
कल्प की भी कल्पना कर,
धीर बांधूँ,
किन्तु कैसे व्यर्थ की आशा लिये,
यह योग साधूँ !
जानता हूँ,
अब न हम तुम मिल सकेंगे !
आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे
?
.....कितना
साम्य
था
उन
फेंके
हुए
काग़ज़ों
के
शब्दों
और
इस
कविता
की
पंक्तियों
में!
बेटी,
तुम्हें
और
सस्पेन्स
में
नहीं
रखना
चाहता।
इंग्लैण्ड
की
राजधानी
लन्दन
और
कैनेडा
की
राजधानी
औटवा
की
दूरी
ने
तुम
सब
को
देखने
की
अभिलाषा को
जैसे
किसी
अन्जान
वादी
में
भटका
दिया
हो -
मैं
स्वास्थ्य
के
कारण
और
तुम कार्यवश
तथा
अवकाश
के
अभाव
के
कारण,
दोनों
ही
अपने-अपने
शहर
को
नहीं
छोड़
पाते।
तुम
जिस
प्राइमरी
स्कूल
में
पढ़ती
थीं,
उसी
के
पास
वुडसाइड पार्क
ट्यूब
स्टेशन
के
साथ
वुडसाइड
अवेन्यू
पर
प्रायः
घूमने
जाता
हूँ
जहाँ
दोनो
ओर
सुन्दर
वृक्षों
की
श्रृंखला
है
और
रास्ते
में
वही
स्कूल
तुम्हारे
बचपन
की
यादें
ताज़ा
करती
रहती
है।
लगभग
उसी
समय
पर
एक
पुलिस
ऑफ़िसर
भी
नित्य-दिन
की
गश्त
पर
मिल जाता
है।
बड़ा
मिलनसार
और
स्वभाव
से
हँसमुख
है।
बातों
में
हँसी-मज़ाक
भी
कर
लेता
है।
आज
रोज़
की
तरह
प्रातः
सैर
के
लिये
उसी
वुडसाइड
अवैन्यू
पर
जा
रहा
था
कि
काग़ज़ों
के
एक
पुलन्दे
पर
पाँव
की
हल्की-सी
ठोकर
लगी।
मैं
वहीं
रुक
गया।
अपनी
छड़ी
से उसे
हिलाया
और
झुक
कर
उठा
लिया।
देख
ही
रहा
था
कि
इस
में
क्या
है,
वही
पुलिस
ऑफ़िसर
भी
पास
आ
गयाः‘
हैलो
सीनियर!
क्या
कोई
खज़ाना
मिल
गया
है?"
मुस्कुरा
कर
बोला।
पैन्शनर
(सीनियर
सिटीज़न)
के
नाते
वह
मुझे
मज़ाक
में
सीनियर
ही
कह
कर
सम्बोधित
करता
था।
मैं
ने
भी
परिहास
की
भाषा
में
उत्तर
दियाः ‘
आप
ही
देख
कर
बताओ
कि
कहीं
किसी
आतंकवादी
का
रखा
हुआ
बम
तो
नहीं
है?’
उसने
हंसते हुए
पुलन्दा
मेरे
हाथ
से
ले
लिया
और
देख
कर
कर
कहने
लगाः ‘
लोग
इतने
सुस्त
और
लापर्वाह
हो
गये
हैं
कि
रद्दी
के
काग़ज़
बराबर
में
रखे
हुए
डस्ट
बिन
तक
में
भी
नहीं डाल
सकते !
लाओ,
मैं
ही
डाल
देता
हूँ।
मैं
उन
काग़ज़ों
को
अपने
हाथों
में
उलट-पलट
ही
रहा
था
कि
देखा
कि
पत्रों
के
साथ
एक
विवाह-प्रमाण
पत्र
भी
था।
मैं
ने
उसका
ध्यान
इस
की
ओर
आकर्षित
किया।
कुछ
क्षणों
के
लिये
तो
वह
स्तब्ध
रह
गया।
चेहरे
पर
आर्द्रता
का
भाव
झलक
उठा-‘
ये
किसी
की
धरोहर
है।
मैं
इसे
पुलिस-स्टेशन
में
जमा
करवा
दूँगा।‘
मेरी
उत्सुकता
और
भी
बढ़
गई।
मैं
ने
उन
पत्रों को
देखने
की
इच्छा
प्रकट
की
तो
उसने
कहा
कि
यह
बण्डल
क्योंकि
तुम्हें
ही
मिले
हैं,
तुम
पुलिस-स्टेशन
जा
कर
देख
सकते
हो
और
यदि
छः
मास
तक
किसी
ने भी
इस
के
स्वामित्व
का
दावा
नहीं
किया
तो
हो
सकता
है
कि
यह
तुम्हारी
ही
सम्पत्ति मानी
जाये।
उत्सुकता-वश,
मैं
दोपहर
के
समय
पुलिस-स्टेशन
चला
गया।
संयोगवश
स्वागत-कक्ष
में
वही
ऑफ़िसर
ड्यूटी
पर
था।
औपचारिक
कार्यवाही
के
पश्चात
मैं
एक
एकांत
कोने
में
बैठ कर
पढ़ता
रहा।
बेटी!
ये
मुड़े-तुड़े
पुराने
साधारण
से
दिखने
वाले
काग़ज़
एक
हृदय-स्पर्शी
पत्रों
का
संग्रह
था
जिस
में
कुछ
पत्र
प्रथम
विश्व-महायुद्ध
में
युद्धस्थल
से
किसी
सैनिक ‘राइफलमैन
जॉर्ज
वाइल्ड‘
ने
अपनी
इकलौती
प्यारी
बेटी ‘ऐथल
’
के
नाम
लिखे
थे। कैसी
विडम्बना
है!
उसके
उद्गार,
उसके
अरमान,
उसकी
सिसकती
वेदना आज
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