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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-23, अप्रैल, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। कविता ।।

 

 

विज्ञापनों का गोरखधंधा

 

विज्ञापनों ने ढँक दिया है

सभी बुराईयों को

हर रोज़ चढ़ जाती हैं उन पर

कुछ नामी-गिरामी चेहरों की परतें

फिर क्या फ़र्क पड़ता है

उसमें कीडे हों या कीटनाशक

या चिल्लाये कोई सुनीता नारायण

पर इन नन्हें बच्चों को कौन समझाये

विज्ञापनों के पीछे छुपे पैसे का सच

बच्चे तो सिर्फ टी.्ही. और बड़े परदे

पर देखे उस अंकल को ही पहचानते हैं

़िद करते हैं

उस सामान को घर लाने की

बच्चे की ज़िद के आगे

माँ-बाप भी मज़बूर हैं

ऐसे ही चलता है

विज्ञापनों का गोरखधंधा।

 

    कृष्ण कुमार यादव

वरिष्ठ डाक अधीक्षक

कानपुर नगर मण्डल कानपुर (उ0 प्र0) - 208001

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माह के कवि

 

- ई-पार्क

- गौरेया

- गुर्दा

-  पेज थ्री

- रिश्तों का अर्थशास्त्र

- विज्ञापनों का गोरखधंधा

 

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तकनीकः प्रशांत रथ

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