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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-23, अप्रैल, 2008

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।। कविता ।।

 

 

चाय पिलाई जाए

(हास्य-व्यंग्य रचना)

 

आफ़िस से जब शाम को साहब वापस आए,
पत्नी से बोले ज़रा चाय पिलाई जाए,
चाय पिलाई जाए जरा सी अदरक वाली,
कड़क, मसालेदार, दूधिया, मिर्च भी काली,
पत्नी बोली प्राणनाथ तुम यह लो माचिस,
मैं भी थकी हुई आई हूँ फ्राम द आफिस,

 

मेरी एक सहेली जिसका नाम है ईशा,
उसके पति बड़े सज्जन श्रीमान कपीशा,
श्रीमान कपीशा चाय नाश्ता नित्य बनाते,
प्याज़ काटते, मूली घिसते, हंसते गाते,
संग चाय के ज़रा पकौड़ी न कर देरी,
बहुत हो गया अब प्रभुसत्ता होगी मेरी,

 

मेरी तेरी बात में बस इतना ही ज्ञान,
मंदिर जितना पास है दूर उतना भगवान,
दूर उतना भगवान सुनो पत्नी जी प्यारी,
बात तुम्हारी शत प्रतिशत दो कुंटल भारी,
चटपट चाय बनाकर आज मैं तुम्हें पिलाऊँ,
और पकौड़ी झटपट बढ़िया तुम्हें खिलाऊँ,

 

साहब नें फिर गैस में दे दी आग लगाए,
चढ़ा भगोना बन गई पानी जैसी चाय,
पानी जैसी चाय सुड़क कर पत्नी बोली,
मैं तो ऐसे ही करती थी हँसी ठिठोली,
साहब बोले प्रभुसत्ता तो होगी तेरी,
लेकिन प्रभुसत्ता वाली तो हैगी मेरी।

 

हँसिए बाँहें खोल कर साँसों को गहराए,
मुस्का कर ही बोलिए हाय हो चाहे बाय,
हाय हो चाहे बाय प्रेम सागर में बहिए,
उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम कहीं भी रहिए,
खुले हुए जीवन के उलझे फीते कसिए,
हीही  हाहा  हूहू  हेहे  होहो  हँसिए।

 

    अभिनव शुक्ला

1000, 8th Ave, Apt 607

Seattel, WA, 98104, USA

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कविताएँ

 

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