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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-23, अप्रैल, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। कथोपकथन ।।

 

 

बख्शी ने छायावाद के लिए भक्तिवाद नाम सुझाया था


पद्मश्री पं.मुकुटधर पांडेय से जयप्रकाश मानस की बातचीत

 

  प्रातः स्मरणीय पद्मश्री पं. मुकुटधर पांडेय का 90 जन्मदिन। बधाई देने के लिए डॉ. बलदेव और मैं उनके बैकुंठपुर निवास पर। जाने कितने मुद्दों पर चर्चा हुई थी। वे बोलते गए और मैं उन्हें नोट करता चला गया था। उनसे हुई बातचीत फाइल में दबी मिली, अब उसे यहाँ पहली बार प्रकाश में लाया जा रहा है - संपादक

 

मानस दादाजी, कुछ आलोचक आपको छायावाद के जनक के रूप में देखते हैं। डॉ. बलदेव जी यहाँ बैठे हैं, उनके अध्ययन एवं शोध की दिशा भी कुछ ऐसी ही है। आप इसे किस रूप में लेते हैं।

पांडेय जी छायावाद के असली पुरस्कर्ता मैं प्रसादजी को मानता हूँ। मैंने उत्तरद्विवेदीयुगीन कविता में एक खास परिवर्तन देखा। उस समय इस नई कविता के लिए नामकरण की समस्या थी, इसके लिए मैंने विद्वानों से राय ली थी। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने भावना-योग अपरोक्ष ज्ञानवाद तथा पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी ने इसके लिए भक्तिवाद या अध्यात्मवाद नाम सुझाया था। उस समय की नई कविता लाक्षणिक थी, ऐसी शैली की रचनाओं में भाव स्पष्ट नहीं थे, उसमें एक धुंधलापन था, मानों वह भाव नहीं भावों की छाया हो, अभिव्यक्ति की नई शैली या सांकेतिक शैली के अर्थ में ही उस समय की नई कविता को छायावाद नाम दिया था।  मैंने जबलपुर से निकलने वाली पत्रिका श्री शारदा के अंक 5,6,8 तथा 9 में एक लेख माला लिखी थी, जिसका शीर्षक था छायावाद क्या है, हिंदी में छायावाद उसमें मैंने प्रसाद जी के झरना का उल्लेख किया था।

 

डॉ. बलदेव पंडित जी, प्रसाद जी ने तो आपको ही छायावाद का पुरस्कर्ता कहा है...

पांडेय जी यह उनकी महानता है। हिंदी में भाव प्रधान नई शैली की कविता लिखने वालों में प्रसाद जी पुरोगामी थे। सन 192मानस - में जब मैंने हिंदी में छायावाद शीर्षक लेखमाला लिखी, तब उनका झरना छप चुका था। सन 1937 की बात है। मैं रायगढ़ नरेश स्व. राजा चक्रधर सिंह के साथ प्रवास में था। काशी में हिंदू विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के अध्यक्ष महामहोपाध्याय पं. बालकृष्ण मिश्र के यहाँ ठहरा हुआ था। समाचार पत्र में प्रसाद जी की अस्वस्थता का समाचार पढ़ने में आया। मेरी इच्छा उन्हें देख आने की हुई। मैं गोवर्द्धन सराय स्थित उनके निवास-गृह पहुँचा। सूचना मिलते ही उन्होंने मुझे तुरंत बुलवा लिया। वे अटारी पर थे। मैंने देखा वे शेषशायी हैं, उठने-बैठने यहाँ तक बोलने में असमर्थ हैं, हृदय आघात-सा लगा। उन्होंने अत्यंत धीमी आवाज में कहा आप छायावाद के पहले कवि हैं। मैंने तो आपका अनुसरण किया था। उनकी आँखें सजल हो गई। मैने कहा किसी स्वास्थ्य निवास में क्यों नहीं चले जाते। तो बोले अब काशी छोड़ने की इच्छा नहीं होती।

 

मानस दादाजी, यह तो आपकी महानता है, दरअसल छायावाद नाम का नामोल्लेख तो प्रथम बार तो आपने ही किया डॉ. (बलदेव) साहब ने तो हितकारिणी की वे दो प्रतियाँ भी ढूंढ निकाली हैं, जिसमें सन 1918 में ही आपने कहा था

भाषा क्या वह छायावाद

है न कहीं उसका अनुवाद

पांडेय जी हाँ, डॉ. बलदेव ने मेरी साहित्य सामग्री का बड़े मनोयोग से शोध किया है। उन्होंने अपने खर्च से मेरी प्रतिनिधि रचनाओं का प्रकाशन विश्वबोध तथा छायावाद एवं अन्य श्रेष्ठ निबंध के नाम से किया है। इसके लिए बलदेव जी साधुवाद के अधिकारी हैं।

 

मानस जी हाँ, छायावाद को तत्कालीन साहित्यिक प्रवृत्तियों से भिन्न किस तरह देखा गया ?

पांडेय जी अभी मैंने कहा कि, उस समय की नई कविता में सांकेतिकता थी, उसमें भाव स्पष्ट नहीं धुंधले होते थे। यह कविता, द्विवेदी युगीन कविता जिसमें इतिवृत्तात्मकता की प्रवृत्ति थी, से भिन्न थी, आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे स्पष्ट किया है छायावाद शब्द को दो अर्थों में लेना चाहिए। एक रहस्यवाद के अर्थ में दूसरा काव्य शैली अर्थात् प्रतीक शैली में। मैंने स्पष्ट लिखा था छायावाद का भाव राज्य की वस्तु है, उसमें संकेत से ही काम लिया जाता है। भाषा उसमें भाव-प्रकाशन का एक गौण साधन मात्र है।

 

मानस आप निजी तौर पर छायावाद की पहली रचना किसे मानते हैं ?

पांडेय जी यह तो मैंने पहले ही कहा है कि नई कविता लिखने वालों में प्रसादजी पुरोगामी थे। उनकी झरना प्रकाशित हो चुकी थी, जिसकी इन पंक्तियों ने मुझे प्रभावित किया था, मैंने उनमें एक नई शैली देखी थी

कर गई प्लावित तन मन सारा

एक दिन तव अपांग की धारा

हृदय से झरना

बह चला, जैसे दृग जल ढरना

प्रणय वन ने किया पसारा

कर गई प्लावित तन मन सारा

डॉ. बलदेव पांडेय जी, इस प्रकार की कविताएं तो आप भी सरस्वती में लिख रहे थे

मेरे जीवन की लघु तरणी

आँखों के पानी में तर जा

और भी कुररी के प्रति जैसी कविता आपकी लेखमाला के आसपास ही सन् 1920 में छपी थी। मैं समझता हूँ, आपकी ही नहीं समूची हिंदी किवता में शिल्प शैली वस्तु विधान की दृष्टि से वह सांकेतिक शैली में थी, और फिर सभी आपको ही छायावाद का जनक मानते हैं और कुररी के प्रति को छायावाद की भूमि निर्दिष्ट करने वाली कविता मानते हैं।

पांडेय जी विदूषां किम् न शोभते, दरअसल किसी एक को इसका श्रेय नहीं दिया जाना चाहिए। उस समय प्रसाद के अतिरिक्त मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, निराला और पंत भी नई शैली की कविता लिख रहे थे। इसलिए विद्वानों में मतैक्य नहीं पाया जाता।

 

मानस छायावाद के कवियों में प्रसाद निराला, पंत और महादेवी वर्मा को समादृत किया जाता है, आपको नहीं, आलोचकों की कितनी तटस्थता है ?

पांडेय जी देखिए आलोचकों का इसमें दोष नहीं है, पूजा फूल 1915 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद मेरा दूसरा कोई काव्य संकलन नहीं निकला था। इसलिए हो सकता है, मेरी रचनाएँ आलोचकों की दृष्टि से ओझल हो गई हैं।

बलदेव परंतु पंडित आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने स्पष्ट ही तृतीय उत्थान की काव्यधारा का प्रवर्तक आपको ही माना है। उन्होंने स्पष्ट लिखा है हिंदी किवता की नई धारा का प्रवर्तक इन्हीं कोविशेषतः श्री मैथिलीशरण गुप्त और श्री मुकुटधर पांडेय को समझना चाहिए। इसके आगे दूसरी जगह उन्होंने आगे भी स्पष्ट शब्दों में लिखा है गुप्त जी तो, जैसा पहले, किसी विशेष पद्धति या वाद में न बंध कर कई पद्धतियों पर अब तक चले आ रहे हैं। पर मुकुटधर जी बराबर नूतन पद्धति पर ही चले।

पांडेय जी आचार्य शुक्ल जी नीर-क्षीर विवेकी थे, मेरा उनका परिचय नहीं था, फिर भी वे मेरी रचनाओं से परिचित थे। उन पर तटस्थता का आरोप नहीं लगया जा सकता।

 

मानस छायावाद सबसे कम अवधि तक प्रभावशील रहा, ऐसा क्यों ?

पांडेय जी देखिए समय परिवर्तनशील है, साहित्य में नित नवीन प्रयोग होते रहे हैं, छायावाद के दो पुरोधा कवि निराला और पंत नवीनता के पक्षधर थे। हिंदी गद्य का उत्तरोत्तर विकास हो रहा था। प्रेमचंद जैसे महान कथाकार हमारे बीच समादृत हो चुके थे। सन 35-36 के आसपास साहित्यकार छायावाद की रहस्यात्मकता और कल्पनाशीलता की जगह यथार्थ का चित्रण करने में लगे थे, और सन 1938 के आसपास पंत ने युगान्त संकलन के द्वारा एक प्रकार से प्रगतिवाद को स्थापित करने की कोशिश की थी। दूसरी बात राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन अपनी चरम सीमा पर थी, इससे भी साहित्यकारों में यथार्थवादी चेतना गोचर हुई। फिर साहित्य में किसी वाद के लिए 2मानस --25 वर्ष कम नहीं होते।

 

मानस क्या इसे आप छायावाद का पराभव मानते हैं ?

पांडेय जी ऐसा नहीं है, साहित्य स्थिर नहीं होता, वह सदैव प्रगतिगामी होता है। स्वच्छंदतावाद जो श्रीधर पाठक के समय से शुरू हुई थी, द्विवेदी युग की इतिवृत्तात्मकता के बाद भी उसका विकास नहीं रुका और वह छायावाद के रूप में विकसित हुआ, जिसे उसका स्वाभाविक विकास ही कहा जाएगा। इसी प्रकार छायावाद के दो पुरोधाओं ने अपनी कविता में यथार्थ का सम्मिश्रण कर तत्कालीन कविता को प्रगतिवाद के रूप में विकसित किया।

 

मानस मैं आपकी सृजन-प्रक्रिया को समझना चाहता हूँ।

पांडेय जी हम लोग द्विवेदी युग की उपज हैं। उस समय ब्रज भाषा की कविताएं नए युग की आकांक्षाओं के अनुरूप नहीं थी। अस्तु खड़ी बोली के कवियों ने छोटी-छोटी कविताएं लिखी, जो दैनिक जीवन से संबंधित थी, वे प्रायः उपदेश प्रधान थीं। इसी समय रवीन्द्रनाथ की गीतांजलि को सन 1913 में नोबेल प्राइज मिला, भारतीय कवियों का ध्यान गीतांजलि की ओर गया और हिंदी के कवि भी उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। रवीन्द्रनाथ टैगोर को यह दृष्टि हमारे मध्यकालीन संतकवियों खासकर कबीर और मीरा से मिली थी। रविन्द्रनाथ जी ने Hundred Poem of Kabir का अंग्रेज़ी  संकलन प्रकाशित कराया था। उस समय गद्य में द्विजेन्द्रनाथ राय और रवीन्द्रनाथ ठाकुर की धूम थी। हिंदी में उस समय श्रीधर पाठक, राय देवीप्रसाद पूर्ण, मैथिलीशरण गुप्त, हमारे अग्रज लोचनप्रसाद पांडेय की भावमयी कविताएँ छपती थीं, अंग्रेज़ी के वर्डसवर्थ, कॉलरिज, शेली आदि की तथा बंगला के कवियों खासकर रवीन्द्रनाथ टैगोर और मधुसूदन दत्त की कविताओं का हिंदी अनुवाद हो रहा था, मैंने स्वयं कुछ चुनी हुई कविताओं का अनुवाद किया था, इनका मिला-जुला प्रभाव मेरी रचनाओं में अवश्य पड़ा है।

 

मानस आपका दौर छंदमयी रचनाओं का रहा है। छंद का आग्रह इधर लगातार घट रहा है। प्रगतिवादियों की कविता में इसे ढूंढ पाना कठिन लगता है, जबकि कई कवि छायावाद से इधर आए हैं। ऐसा क्यों हो रहा है ?

पांडेय जी दरअसल छंद कविता का एक अनुशासन है। छंद से कविता प्रवाहमयी हो जाती है। छंद में एक स्वर साम्य पाया जाता है, जिसका एक मनोवैज्ञानिक महत्व है। अपि मषं कुर्यात् छंदो भंग न कारयेति की कहावत तो प्रसिद्ध ही है। डॉ. बलदेव ने आधुनिक कवियों पर बहुत लिखा है, वे इस विषय में ज्यादा बता सकेंगे, कि प्रगतिवादी कविता में छंद का आग्रह क्यों घट रहा है।

डॉ. बलदेव पांडेय जी जहाँ तक मैं समझता हूँ आप भी पुराने बंधनों की तुलना बेड़ी से करते हैं। कविता को छंद के बंधन से आजाद करने वाले निराला भी मानते थे कि जब विश्व के तमाम देश स्वतंत्र क्यं परंतु यह प्रश्न उचित नहीं लगता कि प्रगतिवादियों में छंद ढूढ पाना कठिन लगता है, जहाँ तक मेरा ख्याल है। अज्ञेय और मुक्तिबोध की शुरुआती दौर की रचनाएं छंदबद्ध ही हैं। केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, त्रिलोचन, शील, बच्चन, अंचल, सुमन ने छंद का अनुशासन कभी नहीं तोड़ा है। हालांकि नए युग के अनुरूप उन्होंने भी मुक्तछंद में कविता लिखी, जहाँ तक निराला और पंत की मुक्त छंद की कविता है। उन्होंने घनाक्षरी को ही आधार बनाया, इसीलिए उनकी कविता में अबाधित लय है, प्रसाद जी ने मुक्त छंद की रचना की है । प्रसाद जी ने प्रलय की छाया जैसी मुक्त छंद की रचना में धनाक्षरी को ही तोड़कर रचना की है। हाँ प्रयोगवाद तथा नई कविता के कवियों ने मुक्त छंद में अधिकांश रचना की है। उनमें भी परंपरागत छंदों को तोड़कर मुक्तछंद में अवांछित लय वाले गीत भी लिखे  हैं, यह प्रवृत्ति नवगीतकारों तक में पाई जाती है।

शेषांश

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

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