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लोकतंत्र, भगवान और दूध
दुर्गेश चन्द्र पाठक
'विप्लव'
रत्ती
सोच में डूबी चली जा रही थी। उसे आज काम पर जाने में देर हो गई
है। तीन दिनों से उसका मुन्ना बीमार है। सरकारी अस्पताल के
डॉक्टर
ने दवाएं लिखी थीं,
पर जैसा लोकतंत्र में होना चाहिए वो दवाएं
अस्पताल में न थी। हाँ, सामने के
मेडिकल स्टोर में
ज़रूर
उपलब्ध थी। कारण लोकतंत्र जनता की सरकार है तथा सरकारी
सम्पत्ति जनता की सम्पत्ति है सो
डॉक्टर
ने अपनी सम्पत्ति से ये दवाएं उठाकर मेडिकल स्टोर वाले को
ब्लैक कर दिया। जनता को सीधे लाभ मिल गया। अगर रत्ती पढ़ी-लिखी
होती तो जान पाती कि ये दवाएं सरकारी अस्पताल की ही हैं और उन
पर स्टीकर लगाकर दाम डाल दिये गये हैं। लेकिन क्या
फ़र्क
पड़ता है पढ़े-लिखे होने से भारत की पैंसठ प्रतिशत आबादी साक्षर
है पर क्या ये सब रूक पा रहा है?
अच्छा ही हुआ कि रत्ती ये नहीं जानती वरना
उसका दु:ख बढ़ जाता। अब जब दवाएं दुकान से
ख़रीदनी
पड़ी तो रत्ती की सारी जमा-पूँजी उड़ गई। लेकिन मुसीबत अभी खत्म
नहीं हुई थी -
डॉक्टर
ने ये दवाएं दूध के साथ लेने के लिए बताया है। दो दिन तो दूध
वाले ने उधार दे दिया पर आज तो वह अड़ ही गया। उसी दूध का जुगाड़
करने में उसे देर हो गई।
रोज़
रास्ते में पड़ने वाले साढे-आठ मंदिरों के आगे रूककर वह भगवान
को प्रणाम
ज़रूर
करती थी लेकिन आज जाने
क्यूँ
इन सभी के आगे
ज़बरदस्त
भीड़ लगी थी।
रत्ती के पास था समय कम सो वह दूर से ही हाथ जोड़ती चली जा रही
है। आप पूछेंगे ये साढ़े आठ मंदिर कैसे,
तो मसला जरा पेंचीदा-सा है: आठ भगवानों को
तो सेठियों की हाउसिंग स्कीम में मंदिर मिल गये पर एक छोटे
रसूख वाले जूनियर भगवान को अभी पीपल के नीचे ही शरण मिली थी;
सो आठ को पूरे मंदिर और यह आधा सो मिल कर
कितने हुए! तीन साल पहले मुन्ना के बापू की मौत
ज़हरीली
शराब पीने से हुई और तब से रत्ती घर-घर बर्तन माँजकर गुजारा कर
रही है। रत्ती का दुर्भाग्य कि वह जवान है और कुछ-कुछ आकर्षक
भी। एक आजाद देश में एक औरत जवान हो,
आकर्षक हो और उस पर से विधवा हो तो वह
सार्वजनिक सम्पत्ति हो ही जाती है। माँ-बाप ने उसका नाम रति
रखा था मगर वह कब बिगड़ कर रत्ती हो गया ये तो वह भी नहीं
जानती। जब से मुन्ना का बापू मरा है,
मोहल्ले भर के शोहदे रत्ती पर लार टपकाते
घूम रहे हैं
।
ये तो रत्ती किसी को हाथ नहीं रखने देती वरना अब तक तो।
''उई
माँ, इ कलूटिया को भी अभहिंए रास्ता
काटै के रहा?'', काली बिल्ली के
रास्ता काटकर निकलने पर झल्ला पड़ी रत्ती। तभी एक साइकिल वाला
तेज़ी
से आगे निकल गया
था ।
उसने चैन की साँस ली। रत्ती अभी साहब के घर जा रही है। उसे
साहब से बड़ी उम्मीद है। इनके यहाँ उसका दो महीने का पैसा बाकी
है। मालकिन ने उसे इस सप्ताह पूरे पैसे देने का वायदा किया था।
साहब पहले गली के गुंडे थे,
फिर और मेहनत करके उन्होंने शहर के गुंडे
की पदवी अर्जित की तथा पार्ट-टाइम में ठेकेदारी भी करने लगे।
एक दिन साहब ने किसी नेता से सुन लिया कि स्वराज के लिए शहीदों
ने कुर्बानियाँ दी है तो साहब का दिल धक से कर गया
बताओ इतने सालों से ये ससुरा स्वराज टाँग पसारे बैठा है और मैं
इसका कोई लाभ ही नहीं ले पा रहा हॅूं!! धिक्कार है मुझ पर;
अरे स्वराज मतलब अपना राज तो आज से हम भी
राज करेंगे। जैसे-जैसे साहब की लोकतंत्र में आस्था दृढ़ होती
गयी, उनका नाम गुंडई में चमकता गया।
नतीज़ा,
राजनीतिक दलाल उन्हें पसंद करने लगे। साहब
ने भी सोचा हर काम लाइसेंस बनवाकर करना चाहिए अब पुलिस में
भर्ती होने की तो उनकी उम्र थी नहीं सो नेतागिरी करने लगे।
वैसे भी ठेकेदारी में अब उतना लाभ नहीं हो रहा था। रत्ती समझ
नहीं पाती कि कल तक जो पुलिस साहब को पकड़ने के लिये परेशान
रहती थी वही अब उनकी सुरक्षा में लगी रहती है। और तो और,
जिन साहब से सबको डर लगता है खुद उन्हें
किसका डर है जो साथ में पहरेदार लेकर चलते हैं। एक दिन मालकिन
किसी से बता रही थीं कि नेताओं की तनख्वाह बहुत बढ़ गई है।
रत्ती समझ न पायी कि इन सबके लाभ तो बिना किसी शोर-शराबे के
बढ़ते जाते हैं और इधर हम गरीबों की तो कोई सुनवाई ही
नहीं
है। उस बेचारी को लोकतंत्र का असली अर्थ कहाँ पता था लोकतंत्र
अर्थात्
लोक का तंत्र के हित में प्रयोग!!!
घंटी बजाने पर
दरवाज़ा
साहब ने खोला तो रत्ती चौंक गई क्योंकि पहले कभी ऐसा न हुआ था।
हर बार
दरवाज़ा
या तो नौकर रामू खोलता था या फिर मालकिन। वह अभी सोच ही रही थी
कि साहब ने घुड़का,
''का रे,
कहाँ मर गई रहीऌत्ती देर से काहे आई?''
''का करी साहब मुन्ना बहुत बीमार है,
उका
ख़ातिर
दूध चाहत रहा''।
''क्या
बेवकूफ़ी
है''
उसकी बातबीच में ही काटकर साहव गरजे,
'''दूध चाहत रहा'अरे
जिसे देखो दूध पहले तो खाने की मुहताज़
थी अब दूध-घी भी चाहिए। आज तो भगवान दूध पी रहे हैं,
तुझे दूध कौन देगा?''
अब समझी रत्ती मंदिर के आगे जमा भीड़ का
रहस्य। दसियों साल पहले भी ऐसा ही हुआ था और उस बार
उसने भी दूध पिलाया था भगवान को। रत्ती हाथ जोड़ गिड़गिड़ाई,
''हमार कहाँ दूध-घी खावे की औकात साहब,
उ त डागडर बाबू दवाई के साथ दूध
ख़ातिर
कहे रहेन।''
फिर साहब को नरम पड़ते देख आगे बोली,
''साहब
पिछला हिसाब मिल जात त हम मुन्ना क
ख़ातिर
दूध लै जाइत।
''हिसाब
क्या तेरा बाप करेगा
मालकिन बच्चों के साथ मंदिर गयीं हैं दूध पिलावै भगवान को,
रमुआ गाँव गया है,
चल बरतन माँज,
जब मालकिन अइहैं तब मागे हिसाब।
''साहब
आपै कुछ दई दें, ग़िड़गिड़ाई रत्ती मगर
साहब को घूरता पा सकपका कर चुप हो गई। साहब की ऑंखे उसके बदन
का ऐसे मुआयना कर रहीं थीं मानो इस प्रश्न का उत्तर
ढूँढ़
रही हों कि ये जानदार फूल इन चिथड़ों में कहाँ छिपा है। मन मसोस
तथा ऑंचल सम्हालते हुए रत्ती बरतन माँजने बैठ गयी। साहब थोड़ी
देर खड़े-खड़े रत्ती को देखते रहे फिर अपने कमरे में चले गये।
बरतन माँजते हुए रत्ती सोच रही थी कि लोग तो कहत हैं कि भगवान
सबका पालत-पोषत है त फिर हमरे मुन्ना के दूध काहे नहीं मिल रहा
है जब भगवान खुद त गटागट दूध पीयत हयन!!
थोड़ी देर बाद साहब ने पानी
माँगा।
घर में कोई और तो था
नहीं
सो रत्ती को ही पानी लेकर जाना पड़ा। साहब की मेज पर दारू की
बोतल खुली रखी थी। काँपते हाथों से गिलास मेज पर रख रत्ती वापस
जाने लगी तो साहब ने उसका हाथ पकड़ लिया। उनकी
आँखें
चढ़ी हुई थीं। रत्ती ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की तो साहब ने कहा,
''रत्ती रानी,
आज हमें खुश कर दो
महीने के हिसाब से
ज़्यादा
मैं अभी तुम्हें दे
दूँगा''।
''इका करत हौ साहब,
हम्मे छोड़ द,
नाहीं त हम शोर मचाइ देब। ''हा-हा-हा
तेरी चीखें सुनने वाला यहाँ कोई नहीं है;
सब त भगवान को दूध पिलाने में मस्त हैं और
तू हम्मे तरसाय रही है
सच रानी सारी चिन्ता दूर कर
दूँगा
तेरी,
हम नेता हैं नेता,
लोकतंत्र के भगवान;
जो चाहोगी,
दूँगा।
''नाहीं साहब,
हम पर जुलुम मत कर
हम मर जाइब।
''चल
स्साली, अब नाटक मत कर,
साहब ने
ज़ोर
से खींचा तो रत्ती उनकी गोद में जा गिरी। उनके मँह से शराब का
भभका आ रहा था।
''साहब
हम हाथ जोड़त हइ, हम्मे जाए द। बेबस
रत्ती रो पड़ी लेकिन तब तक साहब उसके शरीर से फटी हुई साड़ी अलग
कर चुके थे। रत्ती ने साढ़े-आठ भगवानों को रक्षा के लिए पुकारा
पर वो तो दूध पीने में मस्त थे। गनीमत थी कि द्रौपदी के
चीर-हरण के समय भगवान कृष्ण दुग्धपान नहीं कर रहे थे वरना।
उसके
बाद साहब ने रत्ती के साथ वही सब किया जो लोकतंत्र में
जनप्रतिनिधि जनता के साथ किसी-न-किसी रूप में करते रहते हैं।
रौंदी-कुचली रत्ती को छोड़ साहब खड़े हुए और अपने कुर्ते की
ज़ेब
से सौ-सौ के दो कड़क नोट निकाल रत्ती के बदन पर डाल दिये,
''देखो रानी, हम
जुबान के पक्के हैं तुरतै कैसे
पेमेन्ट कर दिए न अरे हम नेता हैं उ का कहते हैं जनप्रतिनिधि,
का समझी
अरे बुड़बक! रो मत,
लोकतंत्र के भगवान हैं हम
सुद्ध हो गइ तू त आज। अब चल उठ औउर काम निपटा
ज़ल्दी-ज़ल्दी।
लाश की तरह पड़ी रत्ती में हरकत हुई;
धीरे-धीरे उसने अपने कपड़े पहने और इस दौरान
वह
ज़मीन
पर पड़े उन रूपयों को घूरती रही फिर अचानक उसने ये रूपये उठा
लिये और मुन्ना के लिये दूध खरीदने लपकी। रास्ते में साढ़े-आठ
भगवान उसी प्रकार दूध पी रहे थे लेकिन अफ़सोस,
अब किसी दूधिए के पास दूध ही न बचा था
।
सारा दूध सुबह ही बिक गया था
। आख़िर
भगवान को दूध पिलाने का जो सवाल था और जब पुण्य इतने सस्ते मिल
रहा हो तो कोई गधा ही मौका चूकेगा!!!
उत्तर
कथा
संसद भवन के सामने तथा देश भर में लगी महापुरूषों की मूर्तियाँ
रो रहीं हैं। चिड़िया-कबूतरों की बीट से सुशोभित ये प्रतिमाएं
ऑंसुओं से तर-बतर हो अत्यंत वीभत्स दृश्य उपस्थित कर रहीं हैं।
लोग इस बारे में तरह-तरह के कयास लगा रहे हैं क़ुछ मानते हैं कि
अपने ऊपर पड़े चिड़िया-कबूतरों की बीट न साफ होने से व्यथित हो
महापुरूष अपनी हालत पर रो रहे है;
तो कुछ दूसरा किस्सा बयान करते हैं। फिलहाल
इसका कारण जानने के लिये प्रधानमंत्री ने एक उच्च-स्तरीय समिति
का गठन कर दिया है।
कुछ नेता दबी जुबान से यह भी कहते सुने गये हैं कि देश के
कर्णधार हम नेताओं की खराब माली हालत देख ये महापुरूष रो रहे
हैं। कुल मिला कर जितने मुँह,
उतनी बात।
अख़बारों
में चर्चा है कुछ तटीय स्थानों पर समुन्दर का पानी मीठा हो गया
है और केरल के एक चर्च में मरियम की मूर्ति से गमकता पानी
निकल रहा है।
दो दिन तक घर में पड़े रहने के बाद रत्ती ने पुन: काम पर जाना
शुरू कर दिया है। उसने साहब के खिलाफ़
कोई शिकायत कहीं
दर्ज़
नहीं
कराई है क्योंकि अब वह लोकतंत्र का मतलब कुछ-कुछ समझने लगी है।
बी.बी.सी.
के हवाले से अभी-अभी पता चला है कि संसद के आगे लगी गाँधी जी
की प्रतिमा गायब है। उच्च-स्तरीय समिति को इसकी भी जाँच की
जिम्मेदारी दे दी गयी है। अब एक अन्दर की बात--कुछ लोगों ने एक
दुबले-पतले आदमी,
जो मात्र एक धोती पहने था और एक हाथ में
लाठी लिये हुए था, को एक लोटे में
दूध लेकर उस बस्ती की ओर जाते देखा है जिधर रत्ती रहती है!!!
दुर्गेश चंद्र पाठक
'विप्लव'
गोविंद
वल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान
झूंसी, इलाहाबाद, उत्तरप्रदेश - 211019
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