vbn

SRIJANGATHA.COM

साहित्य, संस्कृति व भाषा का अंतर्राष्ट्रीय मंच

सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-23, अप्रैल, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

इस अंक में पढ़िये

समकालीन कविताएँ

बस्तर - 5 कविताएँ - विजय सिंह

समग्र / दृष्टा - प्रभा मुजुमदार   

3 प्रेम कविताएँ - डॉ. त्रिलोक महावर

हँसिकाएँ - अभिनव शुक्ल

माह के कवि - कृष्ण कुमार यादव

 

गीत

नट का वशीकरण - ओम निश्चल

पानी का गीत/ धूप का चिरैया - डॉ. तारादत्त निर्विरोध

नज़र केशरी-गंध उड़ाती - नारायण लाल परमार

नापते दूरी राहों की - मयंक श्रीवास्तव

धुएँ की संगिनि - डॉ. महेन्द्र भटनागर

माह के गीतकार - डॉ. अजय पाठक

 

छंद

दोहा - सूख गई संवेदना - डॉ. रामनिवास मानव

माह के ग़ज़लकार - प्रताप सोमवंशी

 

भाषांतर

रेत(पंजाबी)हरजीत अटवाल - अनुवादः सुभाष नीरव

मुझे अपनी गलती का अहसास होने लगा कि किरन बेचारी गऊ और मैं कितना कसाई!  मैं किरन का गुनहगार था। बिना किसी बड़े कारण से झगड़ा किया। मुझे पछतावा हो रहा था। मुझे पता था कि शराबी बन्दा बाद में पश्चाताप में डूब जाता है, पर यह सच्चा पछतावा था। दूसरे पैग ने मेरा सिर ठीक कर दिया, रात की जिस्म के अन्दर पड़ी शराब को भी जाग लगा दिया...

स्मृतियों के चंदन (छत्तीसगढ़ी रचना) - हरि ठाकुर

लेनिन - (छत्तीसगढ़ी रचना) - केयूर भूषण

 

मूल्याँकन

कबीर का नारी संदर्भ - डॉ. हरेन्द्र सिंह नेगी

कबीर का स्त्री विषयक चिंतन उतना उत्साहजनक नहीं है। पहला कबीर स्वयं पुरुष हैं। स्त्री के गुण अवगुणों का आकलन पुरुष बर्चस्व या पितृसत्तात्मक मानकों के आधार पर हुआ है। जो मान्यताएं, अवधारणाएं, रीति नियम तत्कालीन समाज में थे उनका नियंता भी पुरुष वर्ग ही था। उनके द्वारा स्थापित रीति नीतियों के ढांचे के भीतर जो स्त्री स्वयं को रख पाई उसे अच्छी स्त्री की श्रेणी में रख गया और जो उस ढांचे से इतर स्वच्छंद रही उसे कुलटा, कामिनी, व्यभिचारिणी व तरह तरह के बुरे उपमान प्रदान कर कलंकित किया गया...

दलित साहित्य में सामाजिक न्याय - देवेंद्र चौबे

आर्थिक ढाँचा, लक्ष्य और भाषा - वीरेन्द्र जैन

 

धारावाहिक उपन्यास

पाँव ज़मीन पर (प्रथम भाग) - शैलेन्द्र चौहान

छोटी अइया की पेंशन बँध गई थी । यद्यपि वह बहुत छोटी राशि थी लेकिन एक नियमित आय तो थी ही । उनकी उस आय से भी घर को एक राहत मिली थी । पिता की नौकरी के पहले तक यही आय महत्वपूर्ण मानी जाती थी । इस पेंशन से और कुछ हो न हो छोटी अइया का घर में सम्मान अवश्य बढ़ा था । अब उनकी बातों पर भी बड़ी अइया गौर करने लगी थीं । छोटी अइया भी अपनी अहमियत समझने लगी थीं । जितना बड़ा हमारा घर था उतना ही बड़ा घर पड़ोस में रहने वाली डोकरी अइया का भी  था । हमारे घर के एक कमरे जिसे सब नया मढ़ा कहते थे के साथ ही सटा हुआ डोकरी अइया का भी एक कमरा था...

 

कथोपकथन

बख्शी ने छायावाद के लिए भक्तिवाद नाम सुझाया

(पं. मुकुटधर पांडेय से वर्षों पूर्व हुई बातचीत का अंश)

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने भावना-योग अपरोक्ष ज्ञानवाद तथा पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी ने इसके लिए भक्तिवाद या अध्यात्मवाद नाम सुझाया था। उस समय की नई कविता लाक्षणिक थी, ऐसी शैली की रचनाओं में भाव स्पष्ट नहीं थे, उसमें एक धुंधलापन था, मानों वह भाव नहीं भावों की छाया हो, अभिव्यक्ति की नई शैली या सांकेतिक शैली के अर्थ में ही उस समय की नई कविता को छायावाद नाम दिया था...

 

हिंदी-विश्व

अहिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी - डा.महीप सिंह

 

बचपन

 कविता-पापा, भइया ऐसा क्यों है - सौरभ शर्मा 'निर्भय'

बाल कहानी-बहादुरी - उत्कर्ष पाण्डेय 'गुलशन'

 

प्रवासी-पातियाँ

अमेरिका की धरती से...

रेणू होने का मतलब - लावण्या शाह

मॉरीशस की डायरी...

स्वतंत्रता बनाम मोह-भंग - विनय गुदारी

 

शेष-विशेष

शोध....

हिंदी लघुकथा का विकास (भाग-7) - डॉ. अंजलि शर्मा

 मीडिया...

कौन डरता है मीडिया की आचार-संहिता से - संजय द्विवेदी

विचार....

भविष्य का धर्म-दर्शन:स्वरूप एवं प्रतिमान- महावीर जैन

 

 

      

संपादकीय

लघुकथा का निबं : जयप्रकाश मानस

लघुकथा लेखकीय उपस्थिति रहित विधा है । लघुकथा और जीवन के मध्य किसी की सत्ता स्वीकार नहीं है । लेखक यहाँ अदृश्य रहता है । उसी अदृश्यता में ही उसकी उपस्थिति होती है । रचना में उसकी उपस्थिति कला को खंडित करती है। उसे बोझिल बनाती है । पाठक और रचना के बीच व्यवधान बनती है । लघुकथाकार की अनुपस्थिति ही लघुकथा को कलासमृद्ध बनाती है । तो हम कह सकते हैं कि लघुकथाकार अन्य विधाकारों से कहीं अधिक त्यागी है । ज्यों-ज्यों लघुकथाकार अपनी उपस्थिति के संभ्रमी दलदल में जा गिरता जाता है त्यों-त्यों लघुकथा की दम घुटने लगता है । कह सकते हैं कि लघुकथा में कला का सीमित प्रक्षेपण होता है...

 

 

आत्मकथा

स्मृतियों के गलियारों से... - नरेन्द्र कोहली

हम पैदल पुल की चढ़ाई चढ़ रहे थे। पुल का निचला तल पाकिस्‍तान का था। उसकी रक्षा के लिए एक बलोच सिपाही, संगीन वाली बंदूक लिए खड़ा हमें घूर रहा था... और मेरे प्राण सूखे जा रहे थे।... दादी को चार-पांच फीट से अधिक साफ-साफ दिखाई नहीं देता था। वे उस बलोच के अस्तित्‍व से सर्वथा अनजान, अपने कष्‍ट के कारण झल्‍ला रही थीं, ''इन मोए मुसलमानों ने हमें हमारे घर से ही निकाल दिया ...''

 

पत्र / आलेख

एक पत्र बेटी के नाम - महावीर शर्मा

हिमालय अदृश्य हो गया - महावीर शर्मा

 

कहानी

लोकतंत्र, भगवान और दूध - दुर्गेश चन्द्र पाठक 'विप्लव'

रत्ती ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की तो साहब ने कहा, ''रत्ती रानी, आज हमें खुश कर दो महीने के हिसाब से ज़्यादा मैं अभी तुम्हें दे दूँगा''''इका करत हौ साहब, हम्मे छोड़ द, नाहीं त हम शोर मचाइ देब। ''हा-हा-हा तेरी चीखें सुनने वाला यहाँ कोई नहीं है; सब त भगवान को दूध पिलाने में मस्त हैं और तू हम्मे तरसाय रही है सच रानी सारी चिन्ता दूर कर दूँगा तेरी, हम नेता हैं नेता, लोकतंत्र के भगवान; जो चाहोगी, दूँगा...

 

व्यंग्य

ओफ्फ ! ये फ़ाईलें... - आर.के.भंवर

फ़ाईल का बनना, सजना, सँवरना और निकलना ये ऐसे विषय है जो पढ़ाई के दौरान बिहारी की नायिका के श्रृंगार वर्णन की याद दिला देती है। स्थानान्तरण के मसले में फ़ाईलें काला जादू का तेवर लिये होती है। काला जादू में गायब लड़की की तरह ये कब गायब हो जाये और शो ख़तम होने से पहले कब मिल जाये, इसे समझना मुश्किल है....

 

पुस्तकायन

हज़ार किताबों का स्वाद एक जगह/डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

नर्क होता शहर और गर्क होते संबंध/रमेश कपूर

बारीक रेखाओं का कलाकार/हरिप्रकाश वत्स

क़िस्सागोई और मनोविज्ञान का मिश्र/ ज़कीया जुबैरी

 

ग्रंथालय में (ऑनलाइन किताबें)

कविता कोश - ललित कुमार

सर्वेश्वरदयाल और उनकी पत्रकारिता -शोध- संजय द्विवेदी

सैरन्ध्री - खंडकाव्य - मैथिलीशरण गुप्त

 होना ही चाहिए आँगन  - कविता - जयप्रकाश मानस

प्रिय कविताएँ - भगत सिंह सोनी

 

हलचल

चाय की गुमटी में साहित्यकार

साहित्य अकादेमी में हरनोट का एकल कहानी पाठ

अमेरिका में बाल कविता प्रतियोगिता संपन्न

रायपुर में लघुकथा पर पहला अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन संपन्न

सौ से अधिक रचनाकारों का सम्मान

राष्ट्रीय अंलकरणों से रचनाकार सम्मानित

 

और इधर भी.....

उत्कृष्ट लघुकथा का बृहत्तर संसार

हिंदी की समृद्धि

उत्कृष्ट कथाओं की बानगी

ललित निबंधों की लहरें

लोक का अकूत आलोक

यादों का समुद्र

सार-सार गहि रह्यो

निक- तकनीक

विचार करते हुए

शब्दों के भीतर

व्यंग्य वाणों की बौछार

बातचीत का सिलसिला

टीका-टिप्पणी का पिटारा

बचपन का समय

 

 

 

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यæ