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इस अंक में पढ़िये
समकालीन कविताएँ
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बस्तर -
5
कविताएँ -
विजय सिंह
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समग्र /
दृष्टा -
प्रभा मुजुमदार
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3
प्रेम कविताएँ
- डॉ. त्रिलोक महावर
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हँसिकाएँ -
अभिनव शुक्ल
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माह के कवि -
कृष्ण कुमार यादव

गीत
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नट का
वशीकरण
-
ओम
निश्चल
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पानी का गीत/
धूप का चिरैया -
डॉ. तारादत्त निर्विरोध
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नज़र
केशरी-गंध उड़ाती
-
नारायण लाल परमार
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नापते दूरी
राहों की -
मयंक
श्रीवास्तव
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धुएँ की
संगिनि -
डॉ. महेन्द्र भटनागर
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माह के गीतकार -
डॉ. अजय पाठक

छंद
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दोहा -
सूख गई
संवेदना -
डॉ. रामनिवास मानव
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माह के ग़ज़लकार -
प्रताप सोमवंशी

भाषांतर
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रेत(पंजाबी)हरजीत
अटवाल - अनुवादः सुभाष नीरव
मुझे अपनी गलती का अहसास होने लगा कि
किरन बेचारी गऊ और मैं कितना कसाई! मैं किरन का गुनहगार था।
बिना किसी बड़े कारण से झगड़ा किया। मुझे पछतावा हो रहा था।
मुझे पता था कि शराबी बन्दा बाद में पश्चाताप में डूब जाता है,
पर यह सच्चा पछतावा था। दूसरे पैग ने
मेरा सिर ठीक कर दिया,
रात की जिस्म के अन्दर पड़ी शराब को भी
‘जाग’
लगा दिया...
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स्मृतियों के चंदन
(छत्तीसगढ़ी रचना) - हरि
ठाकुर
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लेनिन - (छत्तीसगढ़ी रचना) -
केयूर भूषण

मूल्याँकन
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कबीर का नारी संदर्भ
- डॉ. हरेन्द्र सिंह नेगी
कबीर का स्त्री विषयक चिंतन उतना उत्साहजनक नहीं है। पहला कबीर
स्वयं पुरुष हैं। स्त्री के गुण अवगुणों का आकलन पुरुष बर्चस्व
या पितृसत्तात्मक मानकों के आधार पर हुआ है। जो मान्यताएं,
अवधारणाएं,
रीति नियम तत्कालीन समाज में थे उनका नियंता भी पुरुष वर्ग ही
था। उनके द्वारा स्थापित रीति नीतियों के ढांचे के भीतर जो
स्त्री स्वयं को रख पाई उसे अच्छी स्त्री की श्रेणी में रख गया
और जो उस ढांचे से इतर स्वच्छंद रही उसे कुलटा,
कामिनी,
व्यभिचारिणी व तरह तरह के बुरे उपमान
प्रदान कर कलंकित किया गया...
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दलित साहित्य में सामाजिक न्याय
-
देवेंद्र चौबे
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आर्थिक
ढाँचा,
लक्ष्य और भाषा
-
वीरेन्द्र जैन

धारावाहिक उपन्यास
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पाँव ज़मीन पर
(प्रथम भाग) -
शैलेन्द्र चौहान
छोटी अइया की पेंशन बँध गई थी । यद्यपि वह बहुत छोटी राशि थी
लेकिन एक नियमित आय तो थी ही । उनकी उस आय से भी घर को एक राहत
मिली थी । पिता की नौकरी के पहले तक यही आय महत्वपूर्ण मानी
जाती थी । इस पेंशन से और कुछ हो न हो छोटी अइया का घर में
सम्मान अवश्य बढ़ा था । अब उनकी बातों पर भी बड़ी अइया गौर
करने लगी थीं । छोटी अइया भी अपनी अहमियत समझने लगी थीं ।
जितना बड़ा हमारा घर था उतना ही बड़ा घर पड़ोस में रहने वाली
डोकरी अइया का भी था । हमारे घर के एक कमरे जिसे सब नया
मढ़ा कहते थे के साथ ही सटा हुआ डोकरी अइया का भी एक कमरा था...

कथोपकथन
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बख्शी ने छायावाद के लिए भक्तिवाद नाम सुझाया
(पं.
मुकुटधर पांडेय
से वर्षों पूर्व हुई बातचीत का अंश)
आचार्य
महावीर प्रसाद द्विवेदी ने भावना-योग अपरोक्ष ज्ञानवाद तथा
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी ने इसके लिए भक्तिवाद या अध्यात्मवाद
नाम सुझाया था। उस समय की नई कविता लाक्षणिक थी, ऐसी शैली की
रचनाओं में भाव स्पष्ट नहीं थे, उसमें एक धुंधलापन था, मानों
वह भाव नहीं भावों की छाया हो, अभिव्यक्ति की नई शैली या
सांकेतिक शैली के अर्थ में ही उस समय की नई कविता को छायावाद
नाम दिया था...

हिंदी-विश्व
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अहिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी
-
डा.महीप सिंह

बचपन
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कविता-पापा, भइया ऐसा क्यों है
-
सौरभ शर्मा
'निर्भय'
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बाल कहानी-बहादुरी
-
उत्कर्ष पाण्डेय
'गुलशन'

प्रवासी-पातियाँ
अमेरिका की धरती से...
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रेणू होने का मतलब
-
लावण्या शाह
मॉरीशस
की डायरी...
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स्वतंत्रता बनाम मोह-भंग
-
विनय गुदारी

शेष-विशेष
शोध....
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हिंदी लघुकथा का विकास (भाग-7) -
डॉ. अंजलि शर्मा
मीडिया...
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कौन डरता है
मीडिया की आचार-संहिता से
- संजय द्विवेदी
विचार....
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भविष्य का
धर्म-दर्शन:स्वरूप
एवं प्रतिमान-
महावीर जैन
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