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सृजनगाथा

 

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वर्ष-2, अंक-23, अप्रैल, 2008

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।। हलचल ।।

 

 

चाय की गुमटी में साहित्यकार

दिल्ली।भारत के दिल यानी दिल्ली में चाय बेचता हुआ लक्ष्मण राव किसी भी दूसरे चाय वाले की तरह ही नज़र आएगा पर वो अब तक कुल 18 किताबें लिख चुके हैं। दिल्ली में आईटीओ के पास चाय की दुकान चलाने वाले 53 वर्षीय लक्ष्मण के पास 'भारतीय साहित्य कला प्रकाशन' नाम का ख़ुद का प्रकाशन भी है। लक्ष्मण ने बताया कि मैं पिछले 28 या 29 सालों से लघु कहानिया, नाटक और उपन्यास लिख रहा हूँ। उन्होंने बताया कि अपनी पहली किताब नई दुनिया की नई कहानी में मैंने अपने जीवन के सारे संघर्षो और चुनौतियों का जिक्र किया है। यह किताब मैंने 1979 में लिखी थी।


महाराष्ट्र के अमरावती जिले में एक गरीब किसान परिवार में जन्मे लक्ष्मण को हिंदी साहित्य से विशेष लगाव रहा है। उन्होंने 1973 में मुंबई विश्वविद्यालय से हिंदी माध्यम में 10वीं की शिक्षा पूरी की। उन्हे गुलशन नंदा के उपन्यासों से विशेष लगाव रहा है।

 

लक्ष्मण ने कहा कि वह जीवन के शुरुआती दौर में लेखक बनना नहीं चाहते थे, पर एक घटना ने उन्हे ऐसा करने के लिए प्रेरित किया। एक छोटा बच्चा, जो नदी में नहाने गया था, डूब कर मर गया और इस घटना ने उन्हे इतना उद्वेलित किया कि अपनी भावनाओं को एक शक्ल देने के लिए उन्होंने किताबों का सहारा लिया। हालांकि घर के कमजोर आर्थिक हालात की व़जह से उन्हे अपनी पढ़ाई दसवीं कक्षा के बाद छोड़नी पड़ी। आजीविका के लिए उन्होंने कुछ समय के लिए स्थानीय मिल और निर्माण स्थलों पर भी काम किया। पर फिर वह 1975 में दिल्ली आ गए।

 

दिल्ली में दरियागंज इलाके में किताब बाज़ार को देखकर उनका शौक एक बार फिर जाग उठा। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्राचार के माध्यम से स्नातक की डिग्री ली। अपनी जमा पूँजी से उन्होंने एक चाय की दुकान खोली और तब से वह किताबें लिखने में जुट गए। हालांकि उन्हे किसी प्रकाशक से कोई सहायता नहीं मिली। तब उन्होंने सोचा कि वह अपनी किताबों को ख़ुद ही लिखेंगे, प्रकाशित करेगे और बेचेंगे। लक्ष्मण गर्व से कहते है, मेरी कुछ किताबों को आप सार्वजनिक पुस्तकालयों और स्कूली पुस्तकालयों में देख सकते हैं ।

   विनीत खरे, नई दिल्ली से

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