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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-23, अप्रैल, 2008

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।। हलचल ।।

 

 

साहित्य अकादेमी, कथासंधि में हरनोट का एकल कहानी पाठ

 

नई दिल्ली। साहित्य अकादेमी, दिल्ली ने 7 मार्च, 2008 को सायं 6 बजे कथासंधि कार्यक्रम में कथाकार एस. आर. हरनोट के एकल कथा-पाठ का आयोजन रवीन्द्र भवन, नई दिल्ली में किया जिसमें उन्होंने अपनी बहुचर्चित तीन कहानियों-मोबाइल, नदी गायब है और माँ पढ़ती है का पाठ किया।शुरू में साहित्य अकादेमी के उप सचिव व साहित्यकार ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने हरनोट का विस्तार से परिचय करवाया और उनकी कहानियों के बारे में देश के कुछ प्रसिध्द साहित्यकारों कमलेश्वर, ज्ञान रंजन, डॉ. रमेश उपाध्याय और प्रो. दूध नाथ सिंह द्वारा की गई चुनींदा टिप्पणियाँ भी प्रस्तुत कीं। श्री त्रिपाठी ने कहा कि 'कथा संधि' चर्चित कथाकार पर केन्द्रित किया जाता है।

 

कहानियों पर ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने बारी-बारी से अपनी टिप्पणियों में कहा कि मोबाइल कहानी को उन्होंने बाज़ारवाद के ख़तरे से लोगों को अगाह करवाती कहानी बताया। उन्होंने कहा कि 'नदी गायब है' कहानी स्थानीय  संस्कृति पर ख़तरे को गहराई से उद्धाटित करती है। नदी के गायब होने का मतलब पूरी संस्क्ति का नष्ट होना है जिसमें तमाम लोक कथाएं, देवी देवता, रीति रिवाज, लोकाचार रचे बसे हैं, उन सभी पर एक प्रश्नचिन्ह है। अन्तिम कहानी आत्मविश्लेषण जैसी सुन्दर कहानी है जिसकी संवेदना भीतर तक झकझोर देती है।

             

लेखक, अनुवादक सुभाष नीरव ने कहा कि मोबाइल कहानी बाज़ारवाद  को लेकर यह एक सशक्त कहानी है। नदी गायब है कहानी भी बहुत अच्छी है। आज पहाड़ों को जिस बेदर्दी से काटा जा रहा है, विकास के नाम पर जो देश व गाँव में हो रहा है उसे यह कहानी शिद्दत से रेखांकित करती है। हरनोट की कहानियों की खूबी है कि हरनोट अपने अंचल को जितनी गहराई से व्यक्त और रेखांकित करते हैं नि:संदेह वे इनकी कहानियों की शक्ति है जो इधर की कहानियों में बहुत कम देखने को मिलती है।

 

बयान पत्रिका के संपादक प्रो. मोहनदास नैमिशराय ने साहित्य अकादमी को बधाई दी कि उसने एक सशक्त लेखक को बुलाया है। तीनों कहानियों में तीन अलग-अलग विषय हैं जिनका निर्वाह बखूबी हुआ है। उन्होंने कहा कि मैदानों और पहाड़ों में बाज़ारवाद के अलग अर्थ हैं। पहाड़ों में जो बाज़ारवाद घुस रहा है उसने गाँव और पहाड़ों के साथ वहाँ के लोक जीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है जिसे हरनोट ने इन कहानियों में गंभीरता से चित्रित किया है। हरनोट ने इसे झेला है, और हर वह आदमी जो पहाड़ों पर रह रहा है या बाहर से वहाँ जाता है उसे झेल रहा है। स्थानीय संस्कृति के लिए पैदा हो रहे खतरों को उदघाटित करती ये कहानियाँ हरनोट के कथा-श्रम को उद्धाटित करती है। इसलिए वे बधाई के पात्र हैं।

 

अपेक्षा के संपादक डॉ. तेज सिंह ने कहा कि हरनोट ने इन तीनों कहानियों में पहली बार यथार्थ में फैंटेसी का प्रयोग किया है जो उनकी कहानियों में बहुत कम मिलता है। इससे ये कहानियाँ बहुत सशक्त बनी है। इतनी छोटी कहानियों में इतने बड़े और गंभीर विषयों का निर्वाह कोई बिरला लेखक ही कर सकता है। उन्होंने हरनोट की एक अन्य चर्चित कहानी 'दलित देवता सवर्ण देवता' का भी जिक्र किया। मोबाइल कहानी में हरनोट ने एक मासूम भिखारी बच्ची के माध्यम से राजनीति और बाज़ारवाद का जो भयावह चित्र प्रस्तुत किया है वह भीतर तक छू जाता है। इसी तरह नदी गायब है कहानी तो एक बहुत बड़े कैनवस की कहानी है। हरनोट को जनता की शक्ति पर विश्वास है इसलिए वे तमाम रूढ़ियों को इस कहानी में तोड़ते हैं। जो बहुत बड़ी बात है। माँ पढ़ती है कहानी को उन्होंने संवेदना के धरातल पर खरी उतरती सुन्दर कहानी कहा जिसमें माँ के बहाने गाँव के विविध रंग उकेरे गए हैं।

                                        

फिल्म निर्माता व प्रोडयूसर प्रवीण अरोड़ा ने कहा कि वे हरनोट की कहानियों से बेहद प्रभावित हुए हैं। उन्होंने अपनी कहानियों में जो  पहाड़ के चित्र प्रस्तुत किए हैं वे अद्भुत हैं। 'नदी गायब है' के बारे में उन्होंने कहा कि इस कहानी का यथार्थ उन्होंने अपनी फिल्म निर्माण करते हुए किन्नौर में स्वयं देखा हैं वहाँ जो विकास के नाम पर बाहर की कम्पनियाँ पहाड़ की संस्कृति को खराब कर रही है वह सचमुच पहाड़ों के लिए और वहाँ रह रहे लोगों के लिए ख़तरा है।

 

हीरालाल नागर ने तीनों कहानियों पर कहा लोकजीवन को जिस तरह हरनोट ने अपनी कहानियों में लिया है वह बिरला देखने को मिलता है। उन्होंने पहाड़ों में जो जीवन है, विकास के नाम पर जो काम हो रहे हैं उससे पहाड़ों के साथ मनुष्य के लिए भी ख़तरे बने हैं। उन्होंने 'बिल्लियाँ बतियाती है' का उल्लेख करते हुए कहा कि माँ को जिस तरह हरनोट ने प्रस्तुत किया है वह पहाड़ और गाँव की समग्र सांस्कृतिक विरासत को हमारे सामने लाना है।

             

उक्त गोष्ठी की यह एक लाक्षणिक और अप्रेरित घटना थी कि एक साहित्य प्रेमी ने हरनोट की कहानियों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि वे मूलत: एक कवि हैं और साहित्य अकादमी के कार्यक्रमों में आते रहते हैं। लेकिन जिस तरह की कविताएं पढ़ी जाती है वे कुछ खास प्रभाव नहीं छोड़ती लेकिन आज की तीन कहानियाँ सुन कर कहा जा सकता है कि साहित्य अकादेमी इस तरह के सार्थक आयोजन भी करती है। उन्होंने कहा कि हरनोट की कहानियाँ बरसों-बरस याद रहने वाली कहानियाँ हैं।

 

देवेन्द्र चोपड़ा ने कहा कि उन्होंने दूरदर्शन के लिए कई बड़े लेखकों के साक्षात्कार को लेकर फिल्में बनाई है और इसलिए ही उन्हें साहित्यजगत का अनुभव भी है। हरनोट की खासियत यह है कि वे अपनी कहानियों में बिल्कुल सादी और मन को छू लेने वाली भाषा का इस्तेमाल करते हैं।

 

इस मौक़े पर कथन के संपादक डॉ. रमेश उपाध्याय, बलराम अग्रवाल, समकालीन भारतीय साहित्य के संपादक अरूण प्रकाश, संज्ञा उपाध्याय, भगवान दास मोरवाल, सुनील शर्मा, कैवैल्यधाम के निदेशक जे. पी. दौनेरिया सहित कई युवा लेखक भी शामिल थे। ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने अन्त में सभी उपस्थित बन्धुओं और व़क्ताओं सहित हरनोट का भी आभार व्यक्त किया।

    एस.आर.हरनोट की रिपोर्ट

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

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