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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-23, अप्रैल, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। गीत ।।

 

 

नट का वशीकरण


ओम निश्चल

चारों ओर सवाल,

समय के भटके हुए चरण

कौन हल करे

इतने सारे उलझे समीकरण ।

 

गश्‍त कर रहे नियमों के

अनुशासन के घोड़े

सत्‍ता के सुख में डूबी

कुर्सियाँ कौन छोड़े

 

सिंहासन तक नहीं पहुँचतीं

आदम की चीखें

दु:शासन के हाथ हो रहा

जिसका चीर हरण ।

 

चेहरों पर जिनके नकाब

दिखता कुछ उन्‍हें नहीं

आम आदमी भेड़ बकरियों

से पर अलग नहीं

 

जिनके हाथों में

समझौतों के बासी परचम

कत्‍लगाह में बाँच रहे हैं

वे मंगलाचरण ।

 

राजा का फरमान हुआ है

मंत्रीगण सोयें

हत्‍याओं से नहीं कॉंपते

सत्‍ता के रोयें

 

आड़ धरम की लिए

सियासत बेच रही सपने

टूट रहा है लोकतंत्र के

नट का वशीकरण ।

    ओम निश्चल

 जी-1/ 506, उत्‍तम नगर,

नई दिल्‍ली - 110 059

 ◙◙◙

गीतकार

- माह के गीतकार - डॉ. अजय पाठक

- आँसू का इतिहास

- रात गहरी है

- मौसम विद्रुप

- प्रतिकार करूँगा

- देहरी पर दीप रख दो

- ओम निश्चल

- डॉ. तारादत्त निर्विरोध

- नारायण लाल परमार

-  मयंक श्रीवास्तव

- डॉ. महेन्द्र भटनागर

 

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