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वर्ष-2, अंक-23, अप्रैल, 2008
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।। गीत ।।
नट का वशीकरण
ओम निश्चल
चारों ओर सवाल,
समय के भटके हुए चरण
कौन हल करे
इतने सारे उलझे समीकरण ।
गश्त कर रहे नियमों के
अनुशासन के घोड़े
सत्ता के सुख में डूबी
कुर्सियाँ कौन छोड़े
सिंहासन तक नहीं पहुँचतीं
आदम की चीखें
दु:शासन के हाथ हो रहा
जिसका चीर हरण ।
चेहरों पर जिनके नकाब
दिखता कुछ उन्हें नहीं
आम आदमी भेड़ बकरियों
से पर अलग नहीं
जिनके हाथों में
समझौतों के बासी परचम
कत्लगाह में बाँच रहे हैं
वे मंगलाचरण ।
राजा का फरमान हुआ है
मंत्रीगण सोयें
हत्याओं से नहीं कॉंपते
सत्ता के रोयें
आड़ धरम की लिए
सियासत बेच रही सपने
टूट रहा है लोकतंत्र के
नट का वशीकरण ।
जी-1/ 506 ए, उत्तम नगर,
नई दिल्ली - 110 059
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गीतकार
- माह के गीतकार - डॉ. अजय पाठक
- आँसू का इतिहास
- रात गहरी है
- मौसम विद्रुप
- प्रतिकार करूँगा
- देहरी पर दीप रख दो
- ओम निश्चल
- डॉ. तारादत्त निर्विरोध
- नारायण लाल परमार
- मयंक श्रीवास्तव
- डॉ. महेन्द्र भटनागर
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