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नज़र
केशरी-गंध उड़ाती
स्व. नारायण लाल परमार
लिए बालियाँ मौसम आता
ख़ुशबु-ख़ुशबु हो जाता मन ।
धूप गीत गाते हैं पंछी,
कत्थक करती हवा बावरी
चाँदनिया में पेड़ नहाते,
अल्हड़ सारा लगे गाँव री ।
बाँट रही दो-अजुँरी भर-भर
पगडंडी अपनापन ।
खुल जाते हैं भेद समूचे,
दबी-दबी-सी मुस्कानों के
क्षण भर को भी चुप न रहेंगे,
बौराये झुमके कानों के ।
देह इकहरी चूनर ओढ़े
खूब बजाती कंगन खन-खन ।
हरा-भरा हो जाता सब कुछ,
सच होती सपनों की पाती ।
चेहरा खिलता सूर्यमुखी-सा,
नज़र केशरी-गंध उड़ाती ।
पीपल जैसी लम्बी साँसे
गोहराती फागुन की चितवन ।
द्वारा-निकष परमार
पीटर कॉलोनी,
टिकरापारा
धमतरी,
जिला-रायपुर, (छ.ग.)
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