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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-23, अप्रैल, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। गीत ।।

 

 

नज़र केशरी-गंध उड़ाती


स्व. नारायण लाल परमार

 

लिए बालियाँ मौसम आता

ख़ुशबु-ख़ुशबु हो जाता मन ।

 

धूप गीत गाते हैं पंछी,

कत्थक करती हवा बावरी

चाँदनिया में पेड़ नहाते,

अल्हड़ सारा लगे गाँव री ।

 

बाँट रही दो-अजुँरी भर-भर

पगडंडी अपनापन ।

 

खुल जाते हैं भेद समूचे,

दबी-दबी-सी मुस्कानों के

क्षण भर को भी चुप न रहेंगे,

बौराये झुमके कानों के ।

 

देह इकहरी चूनर ओढ़े

खूब बजाती कंगन खन-खन ।

 

हरा-भरा हो जाता सब कुछ,

सच होती सपनों की पाती ।

चेहरा खिलता सूर्यमुखी-सा,

नज़र केशरी-गंध उड़ाती ।

 

पीपल जैसी लम्बी साँसे

गोहराती फागुन की चितवन ।

    द्वारा-निकष परमार

पीटर कॉलोनी, टिकरापारा

धमतरी, जिला-रायपुर, (छ.ग.)

 ◙◙◙

गीतकार

- माह के गीतकार - डॉ. अजय पाठक

- आँसू का इतिहास

- रात गहरी है

- मौसम विद्रुप

- प्रतिकार करूँगा

- देहरी पर दीप रख दो

- ओम निश्चल

- डॉ. तारादत्त निर्विरोध

- नारायण लाल परमार

-  मयंक श्रीवास्तव

- डॉ. महेन्द्र भटनागर

 

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