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देहरी पर दीप रख दो
देहरी
पर दीप रख दो और कुछ लोभान दे दो,
सीस
पहले से झुका है, आज कुछ वरदान दे दो ।
वेदना
को भूलकर मैं, प्रेम के दो गीत गाऊँ,
आज मेरी
अस्मिता को, फिर नयी पहचान दे दो ।
प्रेम करता ही रहा मैं, किन्तु बदले में न पाया,
बेरूखी सहता रहा मैं, गाँठ का सब कुछ लुटाया ।
खोल कर अपने हृदय को, आज सम्मुख आ गया मैं,
आज मेरी भावना को, अब नया सम्मान दे दो ।
लेखनी को भाव तरसा, भावना को बोल तरसे,
बैर अब करने लगा है, शब्द भी जैसे अधर से ।
चाह थोड़ी-सी बची है, द्रौपदी के चीर जैसी,
गीत के ताने बदलने, तुम नये परिधान दे दो ।
देह मिट्टी की बनी है, एक निश्चित बात है यह,
इस जगत् में जन्म लेना, पुण्य की सौगात है यह ।
प्रेम से वंचित यहाँ पर चार पल है चार युग-सा,
प्राण को आधार देकर, स्नेह का अनुदान दे दो ।
डॉ. अजय पाठक
लेन-3,
विनोबा नगर,
बिलासपुर
(छत्तीसगढ़)
- 495001
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