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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-23, अप्रैल, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। गीत ।।

 

 

मौसम विद्रूप

बेचैन धरती है, मौसम विद्रूप,

मरघट-सा सन्नाटा, बादल है चुप ।

 

नयनों के दर्पण में आकृतियाँ पहचानी,

झिलमिल है धुँधलापन, पलकों पर है पानी ।

पल भर में कौंध गई

बिजली-सी भीतर में,

फिर उसके बाद वही, अंधकार घुप्प ।

 

मंदिर की गुंबद पर, बिलकुल ही एकाकी,

मनमारे बैठा है, बेचारा बनपाँखी ।

कंपन है साँसों में,

तन में है बेचैनी,

पोखर में उतराता उसका प्रतिरूप ।

 

साँझ हुई प्राची में, कजरारे नभ छाये,

बरबस ही आशा के बिरवे भी हरियाये ।

संशय में घिर आये,

मन की यह हालत है,

एक तरफ खाई, तो एक तरफ कूप ।

    डॉ. अजय पाठक

 लेन-3, विनोबा नगर,

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) - 495001

  ◙◙◙

 

गीतकार

- माह के गीतकार - डॉ. अजय पाठक

- आँसू का इतिहास

- रात गहरी है

- मौसम विद्रुप

- प्रतिकार करूँगा

- देहरी पर दीप रख दो

- ओम निश्चल

- डॉ. तारादत्त निर्विरोध

- नारायण लाल परमार

-  मयंक श्रीवास्तव

- डॉ. महेन्द्र भटनागर

 

 

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