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मौसम विद्रूप
बेचैन धरती है, मौसम विद्रूप,
मरघट-सा सन्नाटा, बादल है चुप ।
नयनों के दर्पण में आकृतियाँ पहचानी,
झिलमिल है धुँधलापन, पलकों पर है पानी ।
पल भर में कौंध गई
बिजली-सी भीतर में,
फिर उसके बाद वही, अंधकार घुप्प ।
मंदिर की गुंबद पर, बिलकुल ही एकाकी,
मनमारे बैठा है, बेचारा बनपाँखी ।
कंपन है साँसों में,
तन में है बेचैनी,
पोखर में उतराता उसका प्रतिरूप ।
साँझ हुई प्राची में, कजरारे नभ छाये,
बरबस ही आशा के बिरवे भी हरियाये ।
संशय में घिर आये,
मन की यह हालत है,
एक तरफ खाई, तो एक तरफ कूप ।
डॉ. अजय पाठक
लेन-3,
विनोबा नगर,
बिलासपुर
(छत्तीसगढ़)
- 495001
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