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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-23, अप्रैल, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। गीत ।।

 

 

रात गहरी है

 

रात गहरी है, कुहासा भी घना,

व़क्त जैसे थम गया है राह पर।

शीत में भीगी सपन की क्यारिया

और पाला पड़ गया उत्साह पर।

 

आज सूरज भी उगे,

इस बात पर संशय बना है,

इसलिये यह प्राण आतुर

और थोड़ा अनमना है।

ख में छवियामनोहर,

बोल में अभ्यर्थना है।

 

रात गहरी है, कुहासा भी घना

इस कसैली-सी निशा ने आज फिर

जड़ दिये हैं चार ताले चाह पर

दर्द भारी पड़ गया है आह पर।

 

आज भीतर में भयावह ज्वार है,

किंतु कोई नाव से ही खेलता है।

तोड़ देता है किनारों का चलन

और पानी योजनों तक फैलता है।

 

रात गहरी है, कुहासा भी घना

कश्तियाअपनी डुबाई आप ने,

दोष मढ़ने आ गये मल्लाह पर,

हम यहाँ नीचे पड़े हैं थाह पर।

     डॉ. अजय पाठक

 लेन-3, विनोबा नगर,

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) - 495001

  ◙◙◙

 

गीतकार

- माह के गीतकार - डॉ. अजय पाठक

- आँसू का इतिहास

- रात गहरी है

- मौसम विद्रुप

- प्रतिकार करूँगा

- देहरी पर दीप रख दो

- ओम निश्चल

- डॉ. तारादत्त निर्विरोध

- नारायण लाल परमार

-  मयंक श्रीवास्तव

- डॉ. महेन्द्र भटनागर

 

 

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