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रात गहरी है
रात गहरी है,
कुहासा भी घना,
व़क्त
जैसे थम गया है राह पर।
शीत में भीगी सपन की क्यारियाँ
और पाला पड़ गया उत्साह पर।
आज सूरज भी उगे,
इस बात
पर
संशय बना है,
इसलिये यह प्राण आतुर
और थोड़ा अनमना है।
आँख
में छवियाँ
मनोहर,
बोल में अभ्यर्थना है।
रात गहरी है,
कुहासा
भी घना
इस कसैली-सी निशा ने आज फिर
जड़ दिये हैं चार ताले चाह पर
दर्द भारी पड़ गया है आह पर।
आज भीतर में भयावह ज्वार है,
किंतु कोई नाव से ही खेलता है।
तोड़ देता है किनारों का चलन
और पानी योजनों तक फैलता है।
रात गहरी है,
कुहासा
भी घना
कश्तियाँ
अपनी
डुबाई आप ने,
दोष मढ़ने आ गये मल्लाह पर,
हम यहाँ
नीचे पड़े हैं थाह पर।
डॉ. अजय पाठक
लेन-3,
विनोबा नगर,
बिलासपुर
(छत्तीसगढ़)
- 495001
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