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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-23, अप्रैल, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। गीत ।।

 

 

नापते दूरी राहों की


मयंक श्रीवास्तव

सपनों की सौगातों पर रीझे

इन्कलाब की बातों पर रीझे

हम अपनी शर्तों पर नहीं जिए ।

 

हमें नमस्ते करना सिखलाया

पीछे-पीछे चलना सिखलाया

फूल-फूल कर मीठे जुलम सहे

बस शतरंगी गोटें बने रहे

कभी धुरी तो

कभी बने पहिए ।

 

जब भी चाहा बना लिया मोहरा

जीवन जीना सिखा लिया दोहरा

रहे नापते दूरी राहों की

जीत हुई चालाक निगाहों की

चले उधर ही

जिधर चलना चलिए ।

 

जब भी हुआ इरादों पर हमला

निष्ठाओं ने चाल-चलन बदला

होथ जोड़कर झुकना सीख लिया

स्वयं सवारी बनना सीख लिया

मंद-मंद के

मुस्काते बहरुपिये

 

    मयंक श्रीवास्तव

3/31, रविशंकर नगर

भापाल, (मध्यप्रदेश) - 462006

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गीतकार

- माह के गीतकार - डॉ. अजय पाठक

- आँसू का इतिहास

- रात गहरी है

- मौसम विद्रुप

- प्रतिकार करूँगा

- देहरी पर दीप रख दो

- ओम निश्चल

- डॉ. तारादत्त निर्विरोध

- नारायण लाल परमार

-  मयंक श्रीवास्तव

- डॉ. महेन्द्र भटनागर

 

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