|
नापते दूरी
राहों की
मयंक श्रीवास्तव
सपनों की सौगातों पर रीझे
इन्कलाब की बातों पर रीझे
हम अपनी शर्तों पर नहीं जिए ।
हमें नमस्ते करना सिखलाया
पीछे-पीछे चलना सिखलाया
फूल-फूल कर मीठे जुलम सहे
बस शतरंगी गोटें बने रहे
कभी धुरी तो
कभी बने पहिए ।
जब भी चाहा बना लिया मोहरा
जीवन जीना सिखा लिया दोहरा
रहे नापते दूरी राहों की
जीत हुई चालाक निगाहों की
चले उधर ही
जिधर चलना चलिए ।
जब भी हुआ इरादों पर हमला
निष्ठाओं ने चाल-चलन बदला
होथ जोड़कर झुकना सीख लिया
स्वयं सवारी बनना सीख लिया
मंद-मंद के
मुस्काते बहरुपिये
मयंक श्रीवास्तव
3/31,
रविशंकर नगर
भापाल, (मध्यप्रदेश)
- 462006
◙◙◙
|