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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-23, अप्रैल, 2008

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।। गीत ।।

 

 

डॉ. तारादत्त निर्विरोध के दो गीत

 

पानी का गीत

पानी के दरपन पै यों कंकरी न मारो

बिम्बों का जीवन बिखर जायेगा ।

 

पानी के भीतर भी रहता है पानी,

पानी के ऊपर भी बहता है पानी ।

सागर के पानी को हाथों से तोला तो

लहरों का कंचन उतर जाएगा ।

 

संभव न पानी के पानी को आँकना,

लगता ज्यों अपने ही भीतर से झाँकना ।

यौवन को दोषों की आँखों से देखा तो

परदे का बचपन उघर जायेगा ।

 

खारा या मीठा हो पानी तो पानी,

गंदलाया फिर भी सजल है कहानी ।

मोती तलाशोगे निर्जल की तहों से तो

दलदल का दर्शन उभर जाएगा ।

 

धूप की चिरैया

उड़ती है पार-द्वार धूप की चिरैया ।

 

पानी के दर्पण में, बिम्ब नया उभरा,

बिखर गया दूर-पास, एक-एक कतरा ।

पलकों-सी मार गई धूप की चिरैया ।

 

पूरब में कुंकुम का, थाल सजा-सँवरा,

किरणों-सी दुलहन का, रूप और निखरा ।

आँगना गई बुहार धूप की चिरैया ।

 

यहाँ-वहाँ, इधर-उधर, फुदक-फुदक नाचे,

सुख-दुख की आँखों के, शब्दों को बाँचे ।

रोज़ पढ़े समाचार धूप की चिरैया ।

    डॉ. तारादत्त निर्विरोध

 254, पद्मावती कॉलोनी, ए, अज़मेर रोड़

जयपुर, राजस्थान - 302019

 ◙◙◙

गीतकार

- माह के गीतकार - डॉ. अजय पाठक

- आँसू का इतिहास

- रात गहरी है

- मौसम विद्रुप

- प्रतिकार करूँगा

- देहरी पर दीप रख दो

- ओम निश्चल

- डॉ. तारादत्त निर्विरोध

- नारायण लाल परमार

-  मयंक श्रीवास्तव

- डॉ. महेन्द्र भटनागर

 

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