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डॉ.
तारादत्त निर्विरोध के दो गीत
पानी का गीत
पानी
के दरपन पै यों कंकरी न मारो
बिम्बों का जीवन बिखर जायेगा ।
पानी
के भीतर भी रहता है पानी,
पानी
के ऊपर भी बहता है पानी ।
सागर
के पानी को हाथों से तोला तो
लहरों
का कंचन उतर जाएगा ।
संभव न
पानी के पानी को आँकना,
लगता
ज्यों अपने ही भीतर से झाँकना ।
यौवन
को दोषों की आँखों से देखा तो
परदे
का बचपन उघर जायेगा ।
खारा
या मीठा हो पानी तो पानी,
गंदलाया फिर भी सजल है कहानी ।
मोती
तलाशोगे निर्जल की तहों से तो
दलदल
का दर्शन उभर जाएगा ।
धूप की चिरैया
उड़ती
है पार-द्वार धूप की चिरैया ।
पानी
के दर्पण में, बिम्ब नया उभरा,
बिखर
गया दूर-पास, एक-एक कतरा ।
पलकों-सी मार गई धूप की चिरैया ।
पूरब
में कुंकुम का, थाल सजा-सँवरा,
किरणों-सी दुलहन का, रूप और निखरा ।
आँगना
गई बुहार धूप की चिरैया ।
यहाँ-वहाँ, इधर-उधर, फुदक-फुदक नाचे,
सुख-दुख की आँखों के, शब्दों को बाँचे ।
रोज़
पढ़े समाचार धूप की चिरैया ।
डॉ. तारादत्त
निर्विरोध
254,
पद्मावती कॉलोनी, ए, अज़मेर रोड़
जयपुर,
राजस्थान - 302019
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