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पंजाबी
उपन्यास(धारावाहिक-6)
रेत
हरजीत अटवाल
अनुवादः सुभाष नीरव
(आपने अब तक पढ़ा -
भाग
एक
/
भाग दो
/
तीन
/
चार/पाँच) आगे पढ़िए-संपादक

सवेरे सोकर उठा तो सिर में दर्द की एक
तार घूमे जा रही थी। नौ बज चुके थे। पर्दों से रोशनी अन्दर
झाँक रही थी। मैं सैटी पर ही पड़ा हुआ था। मेज़ पर पड़े रात के
जूठे बर्तन,
ख़त्म हुई व्हिस्की की बोतल रात की
कहानी कह रहे थे। मैंने सोचा कि अधिक पी ली होगी,
तभी तो इतनी देर से आँख खुली। मेरी नींद
का शराब से गहरा संबंध हुआ करता था। पव्वा भर शराब पी होती तो
दो बजे तक ही गहरी नींद आती और फिर नींद टूट जाती। अद्धा पीता
तो चार बजे तक नींद आती। रात को ज़रूर पूरी बोतल पी ली होगी
जिससे सुबह के नौ बज गये। मेरे सिर का दर्द बढ़ रहा था। हिला
नहीं जा रहा था। हिम्मत करके बोतल में बची शराब गिलास में डाली
और बग़ैर पानी नीट ही पी गया। पल भर में ही सिर का दर्द धीमा
पड़ने लगा।
मैं उठकर बाथरूम में गया। आईना देखा।
मेरा चेहरा ढीला हुआ पड़ा था,
मानो मैं नहीं,
मेरा दस साल बड़ा भाई हो। आँखों के नीचे
बड़ी-बड़ी थैलियाँ-सी दिख रही थीं। बाल कटवाने वाले हो गये थे।
दाढ़ी भी बढ़ गयी थी। अगर अब जैसी दाढ़ी रखी भी होती,
तो कंघी रखकर कैंची फेरता रहता,
पर अब तो कितने दिन ही बीत गये थे।
मैंने मुँह पर पानी के छींटे मारे। कुछ होश आया। चेहरा कसने
लगा। ब्रश किया तो कुछ और ताज़गी महसूस हुई। मैं कुछ देर तक
खड़े-खड़े आईना देखता रहा और फिर कहा,
“इंदर
सिंह,
कुछ अक्ल कर ! क्या प्रॉब्लम है तेरी
?
घर है,
किरन है,
सोनम है,
बिजनेस है,
और तूने घंटा लेना है !”
फ्रंट रूम में आया,
रात के पड़े बर्तन मुझे काटने को जैसे
दौड़े। रसोई में गया तो
देखा मानो रात में किरन रोटी बनाना बीच
में ही छोड़ गयी थी। ज़रूर रात में झगड़ा हुआ होगा। झगड़ा तो
होता ही रहता है,
पर रात वाले झगड़े के बारे में मुझे कुछ
याद नहीं आ रहा था। मैं कुछ देर सोचता रहा कि क्या हुआ होगा,
पर कोई सूत्र हाथ में नहीं आ रहा था।
मैंने अल्मारी में से बोतल उठाकर एक पैग और पिया और बैठकर याद
करने लगा कि आखि़र हुआ क्या था।
कल शाम हम दफ़्तर में बैठे थे। नया रैप
विनोद किसी बड़ी फर्म का कंट्रेक्ट लेकर आया था कि वे हमारी
टैक्सी और हमारी वैन इस्तेमाल करेंगे। इसी खुशी में मैं अपने
ऊपर वाले दफ़्तर में गया और बोतल खुल गयी। फिर,
विनोद के साथ मैं पब में चला गया। दफ़्तर
में मैं कभी पीता नहीं था। स्टाफ के साथ मैंने किसी किस्म की
दोस्ती डाली ही नहीं थी। यह तो विनोद ने जोर डाला कि नए
कंट्रेक्ट की खुशी मनाई जाये। वह पब में जाना चाहता था,
पर मैंने दफ़्तर में ही शुरू कर दी।
मैंनेजर लैरी भी हमारे साथ था। वहां दो गिलास ज़रूरत से ज्यादा
पिये गये और मैं टुन्न होकर घर लौट आया। घर लौटा तो किरन सोनम
को नहला रही थी। मुझे शराबी हुआ देखकर कुछ न बोली। सोनम को
मुझे पकड़ा कर वह काम में जा लगी। वह रसोई में कुछ कर रही थी।
मुझे भूख लगी थी। वैसे हमारा खाना खाने का समय दस बजे का था।
अभी सात बजे थे। वह मुझे कुछ खाने को देने की बजाय सोनम के लिए
दूध बना लाई और मुझसे कुछ न पूछा। मुझे गुस्सा चढ़ने लगा।
मैंने और पी ली और बस... ।
मुझे अपनी गलती का अहसास होने लगा कि
किरन बेचारी गऊ और मैं कितना कसाई ! मैं किरन का गुनहगार था।
बिना किसी बड़े कारण से झगड़ा किया। मुझे पछतावा हो रहा था।
मुझे पता था कि शराबी बन्दा बाद में पश्चाताप में डूब जाता है,
पर यह सच्चा पछतावा था। दूसरे पैग ने
मेरा सिर ठीक कर दिया,
रात की जिस्म के अन्दर पड़ी शराब को भी
‘जाग’
लगा दिया।
मैंने मुँह में इलायची डाली और सोनम को
पुकारने लगा। मुझे पता था कि किरन तो आज बोलेगी नहीं। मैं सोनम
को आवाज़ें लगाता हुआ ऊपर कमरे में चला गया। किरन एक ओर मुँह
किये पड़ी थी। मैं उसके साथ जा लेटा और सोई हुई सोनम को पेट पर
लिटा लिया। किरन रजाई से नाक दबाने लगी। मैं बोला,
“लुक
सोनम बेटे,
ध्यान से सुन,
तेरा पापा जैसे भादों का जन्मा हुआ है।
भादों के जन्मे को कोई काम कर चुकने के बाद ही अक्ल आती है कि
यह काम ठीक किया है कि गलत। अब तू पूछेगी कि भादों क्या होता
है
?
अगर तुझे पता भी होता तो भी क्या फायदा
होना था। तू तो सो रही है,
जो पड़ोसी जाग रहे हैं,
जब उन्हें मेरे भादों के जन्में का कुछ
नहीं,
तो किसी ओर को भी क्या होगा।"
मैं कुछ देर चुप रहा। किरन ज़रा-सा
हिली। मैंने फिर कहा,
“सोनम
बेटे,
लोग तेरे पापा से बहुत लड़ते हैं,
बाहर तो मैं लड़ लूँ,
पर में तेरी माँ का मुकाबला कैसे करूँ।
तेरे पापा शरीफ़ और तेरी माँ पूरी बाघिन !”
“किधर
से शरीफ हो तुम
?
तुम बघियाड़ हो बघियाड़... तुम मुझे खाये
जाते हो।"
“सोनम,
अपनी माँ को बता दे कि पापा वैजिटेरियन
है। तेरी माँ का सड़ा हुआ मीट कैसे खा सकता है। अपनी माँ से कह
दे,
मेरे से लड़े नहीं।"
मैं लड़ती हूँ
?
मैं
?...
तुम लड़ते हो,
मेरा आगा-पीछा कोसते हो,
तुम मुझे पसन्द नहीं करते तो मेरे से
विवाह क्यूँ करवाया
?
मुझे वापस भेज दो,
मुझे नहीं चाहिए ऐसी इग्लैंड,
मुझसे धड़ी-धड़ी भर की गालियाँ नहीं सुनी
जातीं,
मुझे वापस भेज दो।" बात करते-करते वह
उठकर बैठ गयी। वह रोती भी जाती थी और लड़े भी जाती थी। सोई हुई
सोनम करवटें बदलने लगी। मैंने थपथपा कर उसे फिर से सुला दिया
और कहा,
“सोनम
बेटे,
माँ को बता,
हम कहीं लड़ने वाले बंदे हैं,
हम तो ईंट का जवाब थैंक्यू में दिया
करते हैं। कहीं भूल-चूक हो ही जाती है।"
“ज्यादा
चालाक न बनो,
जब विवाह करवाया था तो तुम्हारी माँ कभी
ऐनक लगाकर,
कभी ऐनक उतार कर मुझे देखती थी। अब
गालियाँ निकालने का क्या काम
?”
माताश्री,
असल में गालियाँ मैं अपनी माँ को निकाला
करता हूँ जिसने तुझे ढूँढ़ा।"
वह मानते-मानते फिर रूठ गयी और मुँह
घुमाकर लेट गयी। मैंने उसके सिर के नीचे बांह का सिहराना दिया
और उसका मुँह अपनी ओर करते हुए बोला,
“देख,
तुझे मैं माताश्री भी इसीलिए कहता हूँ
कि तू मेरी माँ ही है,
जैसे तू सोनम की लुक-आफ्टर करती है,
वैसे ही मुझे भी सम्भालती है,
भला तेरे बगै़र मैं कैसा !”
वह कुछ ढीली पड़ गयी,
पर नाराजगी अभी भी नहीं गयी थी। मैंने
कहा,
“मेरी
अर्द्धागिनी,
चल उठ,
बहुत टाइम हो चला है।"
“आज
नहीं उठना मैंने,
नित-नित का क्लेश मेरे से नहीं सहा
जाता। मैंने इंडिया चले जाना है,
सम्भालो अपनी बेटी और सम्भालो अपना घर,
मैं नहीं किसी काम को हाथ लगाऊँगी।"
अब सोनम जाग गयी थी। मुझे भी व्हिस्की
की और तलब जागी। मैंने सोनम से कहा,
“उठ
बेटे,
तुझे दूध बनाकर दूँ,
भूखी होगी तू। तेरे पापा का क्या है,
उसकी किसे फिक्र है,
परसों की रोटी खायी हुई है,
यह ज़रा पेट पर हाथ रखकर देख,
बिलकुल ही अन्दर घुस गया है।"
किरन ने मेरी ओर देखा और चिंतित होकर
कहने लगी,
“सच,
कल तुमने कुछ नहीं खाया
?”
“नहीं,
तेरे से रोटी माँगी थी,
तू आगे से लड़ पड़ी।"
“सॉरी-सॉरी,
चलो आओ,
रोटी बनाऊँ।"
यह मेरा अन्तिम हथियार था। वह मुझे भूखा
नहीं देख सकती थी। यह हथियार मैं बहुत कम इस्तेमाल करता था कि
कहीं भोंथरा न कर बैठूँ। हम उठकर नीचे आये। उसने जल्दी से
बर्तन संभाले,
कुकर साफ किया और चाय का पानी रखा। साथ
ही,
आमलेट बनाने लगी। मैं व्हिस्की का पैग
बनाने लगा तो वह मुझे रोकते हुए बोली,
“अभी
पूरा दिन पड़ा है,
पचास काम करने वाले हैं,
घर की शॉपिंग भी करनी है,
काम पर से भी फोन आया था।"
“क्यों
?”
“कोई
ड्राइवर कंट्रोलर से लड़ पड़ा है।"
“वहाँ
तो कोई न कोई पंगा पड़ा ही रहता है,
तू ला कुछ खाने के लिए।"
जब से यह बिजनेस लिया था,
तब से ऐसी परेशानियों का सामना करना ही
पड़ता था। इतने साल मैंने
‘सनराइज
मिनी कैब’
के साथ टैक्सी चलाई तो ज़िन्दगी सुखी थी।
कंपनी को किराया दिया,
अच्छी-सी कार ली और बस,
टाइम लगाए जाओ। जितने अधिक घंटे,
उतने ही ज्यादा पैसे। वहाँ मुश्किलें
थीं,
पर दूसरी तरह क। इन कारोबारी मुश्किलों
से वास्ता यह कंपनी खरीद कर पड़ा।
जब यह कंपनी बिकने पर लगी तो हमारी
कंपनी के ड्राइवर इसको लेकर बातें करने लगे। दो हिस्सेदारों की
यह कंपनी थी और उनके झगड़े के कारण काम फेल हो गया था। काम आ
ही नहीं रहा था तो ड्राइवर कैसे टिकते। जो ग्राहक थे,
वे गुम हो गये और कंपनी बन्द हो गयी। यह
एक किस्म का नया काम शुरू करने जैसा ही था।
‘सनराइज’
के साथ इतने बरस काम करने के बाद थोड़ा
अनुभव तो था ही। मुझे यह कंपनी घर के नज़दीक पड़ती थी। मैं इसे
खरीदने के बारे में सोचने लगा था।
काफी समय से बन्द होने के कारण यह कंपनी
दस हजार पौंड में मिल रही थी। दफ़्तर किराये का था। नीचे दुकान
जितना दफ़्तर और ऊपर फ्लैट भी था,
जिसमें से एक कमरा दफ़्तर के लिए भी
इस्तेमाल किया जाता रहा था और बाकी को किराये पर दिया हुआ था।
मैंने काफी कुछ सोच-समझकर सौदा कर लिया।
मैं यही सोचकर चला था कि दस हजार का जुआ ही सही। खो गये तो खो
गये। अगर बिजनेस चल पड़ा तो बहुत ही अच्छा।
इस कंपनी का दफ़्तर ईलिंग के एक स्टेशन
के करीब था। इसका पहले वाला नाम
‘क्राउन
मिनी कैब’
ही रहने दिया और इसकी मशहूरी आरंभ कर
दी। कार्ड छपवा कर घर-घर फेंके गये। लोकल प्रैस में विज्ञापन
दिये। यह स्टेशन तो अधिक नहीं चलता था,
पर ठिकाना अच्छा था। दुकानों की परेड
थी। निकट ही एक पब भी था जो कि काफी भरा रहता और वहाँ से काफी
ग्राहकों के आने की आस थी।
‘सनराइज’
में काम करते कुछ ड्राइवरों को संग
लिया।
‘सनराइज’
का एक कंट्रोलर बौबहेज़ था,
वह भी मेरे साथ आ गया। मैनेजर लैरी को
बना दिया। मैं खुद ड्राइवर के तौर पर काम करता था। कभी
प्रितपाल भी कंट्रोलर का काम करने आ जाता। धीरे-धीरे हमारा काम
चल निकला। ऊपर वाले फ्लैट को किरायेदार से खाली करवा लिया।
‘क्राउन
मिनी कैब’
शुरू करने से पहले ही मैंने यह फैसला कर
लिया था कि अब विवाह करवा लेना है और ज़िन्दगी को रास्ते पर
लाना है। बीटर्स या उस जैसी औरतों का साथ अच्छा था,
पर ज़िन्दगी नार्मल नहीं चलती थी। जैसा
कि बीटर्स के लड़के ने ही अपने अन्दर का नस्लवाद उगल दिया था।
इतनी भर आवारगी में से यह सीख लिया था कि पंजाबी तरीके की
गृहस्थी में से ही मुझे सुख मिल सकता था। किसी की कही छोटी-सी
बात अधिक देर तक मुझे तंग करती रहती। डैनी की बात ने मुझे इतना
ज़ख्मी किया कि काफी समय तक मैं बीटर्स के पास न जा सका।
यद्यपि डैनी बच्चा था,
पर ऐसे बच्चे के साथ मैं कैसे वक्त
गुजारता जो अवसर पाते ही अपनी नफ़रत का इज़हार कर सकता था।
दूसरी ओर,
मेरे भतीजे राणू और दीपक मुझे इतना
प्यार करते थे कि जब भी वे मिलते तो मुझसे लिपट-लिपट जाते।
उनकी ओर देखकर ही लगता कि मेरे भी अपने बच्चे होने चाहिएँ।
मैंने बीटर्स से एक बार फिर कहा,
“बीटर्स,
मुझे एक बच्चा चाहिए तेरे से।"
“मेरे
से कोई आस न रख,
पहले ही बता दिया था तुझे,
तू कोई दूसरी खोज ले।"
मैंने अपनी गुनहगार रूह को कई बार कोसा
और बीटर्स को बग़ैर बताये इंडिया चला गया।
प्रितपाल दो चक्कर इंडिया के लगा चुका
था। पहले वह परिवार के साथ गया और फिर अकेला ही। वह मेरे विवाह
के लिए मैदान साफ करता घूम रहा था। इस बात का पता मुझे वहाँ
जाकर ही चला। उसने कोई लड़की मेरे लिए पसन्द कर ली थी। उसके घर
वालों से बात कर ली थी। मेरे जाने से पहले उसने कहा था,
“अगर
मेरे वश में हो तो किसी टूटी हुई जट्टी से तेरा विवाह करवा
दूँ। जिसे जब मन हुआ पीट लिया और जब चाहे उससे रोटी पकवा ली।"
मैंने भी यही सोच रखा था कि सादी-सी
लड़की चलेगी जो मेरी बात सुनती रहे,
कहना मानती रहे। मैं घर पहुँचा तो माँ
और बापू जी अपने इर्द-गिर्द अखबारें फैलाकर बैठे थे,
लड़कियाँ पसन्द कर रहे थे। एक लिस्ट भी
बना रखी थी। ढेर सारी फोटो लिए फिरते थे। शाम को बापू जी बोतल
खोलते और मुझे एक-एक लड़की के बारे में बताने लगते।
बातों-बातों में मैं भी शराबी हो जाता। माँ झगड़ा करती,
“अगर
विवाह करवाना है तो शराब न पी। शराबी को कौन अपनी बेटी देगा।"
माँ की बात पर बापू जी कहते,
“कौन
बेटी देगा ! ...हमारे बेटे को तो मिनिस्टरों के घरों से रिश्ते
आते हैं। यह तो मैं ही सोचता हूँ कि अपने जैसे के साथ माथा
लगाएँ,
ताकि बाद में पछताना न पड़े।"
फिर,
मुझसे कहने लगते,
“वैसे
बड़े,
हमने एक रिश्ता पसन्द किया हुआ है। अपने
जैसे बन्दे हैं,
जैसे तू सूबेदार का पुत्त,
वैसे वह सूबेदार की बेटी। इतवार को
फगवाड़े जाना है और तुझे पसन्द हो तो हाँ कर दे,
झट मंगनी पट शादी।"
“अगर
तुमने हाँ कर ही रखी है तो... ।"
“हमने
कोई हाँ नहीं की,
पसन्द की है,
हाँ तूने करनी है।"
“फिर
ये इतनी फोटो क्यों उठाये फिरते हो
?”
“ये
तो तेरे सामने चुवाइस रखी है,
यह नहीं तो वह सही।" कहकर वह हँसने
लगते।
इतवार वाले दिन हम लड़की देखने फगवाड़े
गये। लड़की के किसी रिश्तेदार का घर था। लड़की के माँ-बाप और
रिश्तेदार हाजि़र थे। हम भी सभी उपस्थित थे। लड़की साधारण-सी
थी। किसी खास आकर्षण के बिना। प्रितपाल यही कहता था कि तुझे
सादी लड़की ही ठीक बैठेगी। माँ ने मेरे कान में मेरी राय पूछी
तो मैंने कहा कि बाहर चलकर बात करते हैं। हम उठकर बाहर आ गये।
बस-स्टैंड नज़दीक ही था। माँ ने फिर पूछा,
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