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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-23, अप्रैल, 2008

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।। भाषांतर ।।

 

 

स्मृतियों के चंदन


 स्व. हरि ठाकुर

 

स्मृतियों को चंदन की तरह घिस रहा हूँ

सपनों का बार-बार कर रहा हूँ इंतजार।

 

चाँदनी रात को

दुह लिया

रेलों-का सा

आँसूओं को घटक लिया।

 

सुख-दुःख बीनता पवित्र करता हूँ

स्मृतियों को चंदन की तरह घिस रहा हूँ

मन तो धीरे-धीरे पक रहा है

 

बार धोने वाली काली मिट्टी की तरह

घुल रहा है।

 

इस तन को तुम्हारे लिए ही तोड़ रहा हूँ

यादों को चंदन की तरह घिस रहा हूँ

 

ज़िंदगी तो पहाड़ की तरह लग रही है

संग-संग

साँस भी भाग रही है दूर

 

तुम्हारा ही दिया हुआ अर्पण कर रहा हूँ तुम्हें

स्मृतियों को चन्दन की तरह घिस रहा हूँ।

 

मूल छत्तीसगढ़ी से हिन्दी अनुवाद - भगतसिंह सोनी

(कविता संग्रह सुरता के चन्दन से साभार)

 

  भगत सिंह सोनी

रायपुर, छत्तीसगढ़

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