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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-23, अप्रैल, 2008

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।। बचपन ।।

 

 

पापा, भइया ऐसा क्यों है


सौरभ शर्मा 'निर्भय'

 

पापा!

भइया ऐसा क्यों है!

 

मेरे संग ही खेलता है

और मुझसे ही लड़ता,

सुने न मेरी कोई बात

अपने मन की करता,

बात-बात पर गुर्राता है

मुझसे ज़रा न डरता!

पा!

ये गुस्सैला क्यों है!!

 

वैसे कितना प्यारा है

गोरा-गोरा उजला,

गोल-मटोल, नन्हा-मुन्ना-सा

़िदी,चंचल पगला,

करे शैतानी नाचे गाए

कभी बजाए तबला!

पापा!

ये अलबेला क्यों है!!

 

सुन बिटिया की बात, पापा

लगे उसे समझाने,

तुम भी छोटे पर करती थीं

ऐसे ही नज़राने,

अब तुम बड़ी हो, भूल गईं

दिन वे मस्त सुहाने!

बेटा!

तुमको याद न क्यों है!!

  सौरभ शर्मा 'निर्भय'

वरिष्ठ उप संपादक

               दैनिक जागरण, मेरठ

◙◙◙

 

 

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