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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-23,अप्रैल, 2008

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।। अपनी बात ।।

 

 

 

 ।। लघुकथा का निबंध।।

घुकथा पढ़ने-देखने में एक शब्द पर वस्तुतः यह दो भावों का गठबंधन है लघु और कथा । एक-दूसरे के पूरक । यही लघुकथा की शास्त्रीयता है और इस शास्त्रीयता को आत्मसात किये बगैर लघुकथा की सिद्धि असंभव है ।

 

लघुता ही लघुकथा की प्रभूता है और उसमें जो कथा है वही इस लघुता की प्रभूता है । लघु यानी कि विधात्मक तौर पर जीवन की कोई सूक्ष्म इकाई या कोई कोण या फिर कोई दिशा की पड़ताल। और कथा यानी कथा जिसके बारे में फिलहाल किसी व्याख्या या पाद-टिप्पणी की ज़रूरत नहीं है । तो लघुकथा यानी छोटी-सी कथा । न तो कहानी का सार रूप और न ही अंग्रेज़ियत वाली शार्ट-स्टोरी । स्ट्रक्चर और टैक्स्चर दोनों में विशिष्ट और निजी मान्यताओं के साथ । लघुकथा का आशय घटना या समय के हिसाब से क्षण-क्षण की कथा किन्तु संवेदना या सरोकार की दृष्टि से जीवन की संपूर्णता के लिए सूक्ष्म-कथा । लघुकथा मत और मति-भिन्नता से भले ही अनगिनत परिभाषाओं से संपन्न है किन्तु अपने मूल में वह जीवन की आलोचना ही है । जीवन की आलोचना है इसलिए वह (कारण और परिणाम दोनों में) सर्वाधिक गतिशील रचनाकारों की प्रियतम् विधा है । उसकी आत्मा में यथार्थ का निवास है पर वह मात्र यथार्थवादी विधा नहीं उसमें संपूर्ण भारतीयता, संपूर्ण मानवता और संपूर्ण वैश्विकता का अविछिन्न सौंदर्य भी है । फलतः शुष्क प्रगतिशीलता नहीं अपितु गतिशीलता का प्रखर प्रतिनिधित्व करने वाली विधा है और इस मायने में वह वाद नहीं - मानवीय संवाद का अजस्त्र आवाहन है । 

 

लघुकथा को वेद, पुराण, रामायण, महाभारत, पंचतंत्र, हितोपदेश, बौद्ध-जैन, ईसप, जातक बाईबिल आदि की कथाओं की तारत्मयता में भले ही हमारे पुरातत्व प्रिय विधाविद् देख रहे हों । भले ही उसे नैतिक और आध्यात्मिक दृष्टांतों से विकसित मानने की आलोचकीय ज़िद्दी भी हो, किन्तु लघुकथा सांस्कृतिक चेतना से दूर भागते मनुष्य की वापसी के लिए नयी रचनात्मक चेष्टा है । वह हालात का हस्ताक्षर है । इन मायने में उसे दीर्घ ऐतिहासिकता से जोड़कर एक अखंड किन्तु असिद्ध कथा-परंपरा में देखना शायद अतिरिक्त मुगालता है या फिर लघुकथाकारों की आत्महीनता भी । यह मनुष्य की समग्रता के खंड-खंड होने के बरक्स रचनाकारों की संवेदनात्मक और समय-सम्यक विधा है । रंग और रूप दोनों ही दृष्टियों से । उसकी ज़मीन, उसका मर्त्य और उसका आकाश सबकुछ भिन्न है और ऐसी सारी कथागत अवधारणाओं से कहीं अलग । वह स्वयं में विशिष्ट और साहित्य के प्रजातंत्र में पूर्ण स्वतंत्र और पृथक विधा है ।

 

व्यंग्य या तीखापन लघुकथा का रस है पर यह व्यंग्य या लघु-व्यंग्य भी नहीं है । भले ही नामवरीय या परमांनदीय या मैनेजरीय दृष्टि में उसकी परतंत्रता और पंगुता भी दिखती हो पर कमलकिशोरीय और पुष्कणीय चेष्टा के सामने है कोई,  जो उसे स्वतंत्र और अस्मितावान् विधा न मानने को सिद्ध कर सके । एक साहित्यिक विधा की संपूर्ण शर्तों के साथ.....भगवान को धन्यवाद कि ऐसे महानुभावों की कृपा के बगैर ही आज लघुकथा समूचे पाठकीय संसार में कंठहार बन चुकी है और इसके लिए लघुकथाकार और पाठक दोनों ही प्रणम्य हैं । लघुकथाकारों को आभार दिया जाना चाहिए कि उन्होंने लघुकथा के माध्यम से नया पाठकीय स्वाद बगराकर घटती हुई पाठकीयता को बनाये रखा और पाठक को इसलिए बधाई कि उसने अपनी संपूर्ण आस्था और विश्वास लघुकथा की झोली में उड़ेल दिया है। लघुकथा को केवल द्रुत गति वाले समय के दबाब से उपजी, विकसित और स्वीकृत विधा कहना गलत होगा। 

 

यद्यपि साहित्यिक विधाओं के उपवन में यह लघुत्तम है पर समापवर्तक भी है जीवन का। लघुकथा का मतलब जीवन का लघुत्तम समापवर्तन । लघुकथा कई अर्थों में लघु है । वह कथा-कुल की सबसे कनिष्ठ सदस्या है, इसलिए लघु है । लघुकथा गद्य परिवार की सबसे छोटी विधा है । इन दृष्टियों से आप हम उसे लघु कह कर उपेक्षा नहीं कर सकते । पर यदि आप जब कभी उसे चुटकुले या किसी प्रेरक प्रसंग की छवि में आँक रहे होतें हैं तो आप स्वयं को किसी नौसिखिये लेखक, फूहड़ क़िस्म के रचनाकार, संपादक, आलोचक होने का स्वतः प्रमाण भी सौंप रह होते हैं ।

 

लघुता उसका शिल्पगत आचरण है । लघुता भी कैसी ? दूब की मानिंद । चंद्रमा की मानिंद । दूब कभी बड़ी नहीं होती, पर दूब की आभा समूचा वृक्ष भी नहीं जुटा पाता । चंद्रमा भी बड़ी नज़र नहीं आती । फुटबाल जैसा दिखाई देने वाली चंद्रमा छः महाद्वीप, सैकड़ों देश, हजारों नगर, लाखों गाँव और करोड़ों-खरबों लोगों के नाम चाँदनी रचती है । तो लघुता उसका आचरण मात्र है । विनम्र चीज़ों की निशानी है कि वे अपनी हाँकते नहीं । लघुकथा भी हाँकने में कमजोर है । यह उसकी अयोग्यता नहीं वरन् परम-योग्यता का प्रमाण है । है तो वह लघु पर वह एक समूची और सर्वकोणीय कथा का बखान या व्याख्या भी है । उसी कथा से कई कथाओं, इतिहासों, वर्तमानों और भविष्य की दिशा देखी जा सकती है । लघु होते हुए भी उसकी प्रभुता इसी लघुता में विद्यमान है । अपनी प्रभुता को अपनी लघुता में ही दिव्यता देने वाली किसी और विधा का नाम शायद ही आप या हम हिंदी वाले बता सकते हैं ।

 

लघुकथा जीवन के एकांश का साक्षात्कार है, किसी एक दृश्य की वीडियोग्राफ़ी है, व्याधिग्रस्त किसी एक अंतःअंग का एक्सरा है। लघुकथा में अतिरिक्त उपकथा या प्रसंग का प्रवेश वर्जित है । कथा-पात्रों की शारीरिक उपस्थिति भी वहाँ सीमित और अनुशासित है । यही आत्मानुशासन लघुकथा में संक्षिप्ततता का आवश्यक उपकरण है । और संक्षिप्ततता के लिए चुस्त-दुरुस्त किन्तु स्वाभाविक वाक्य विन्यास अपरिहार्य है । ऐसे में जाहिर है कि शब्द अमिधा से कम व्यंजकता से अधिक प्रतिष्ठित हों । कथ्य और कथोपकथन या कथा-वर्णन निहायत स्वाभाविक हों । इसे एक चमकदार लघुकथा का खास आकर्षण कह सकते हैं । कृत्रिमता का लघुकथा से स्थायी बैर है । कथावस्तु और भाषा-शिल्प दोनों की ही दृष्टि से । हम जब लघुकथा की भाषा की बात करते हैं तो उसमें सहजता, पात्रानुकूलता, रोचकता, समकालीनता और संपूर्ण संप्रेषणीयता की भी बात करते हैं ।

हम सभी जानते हैं कि लघुकथा की आकृति को लेकर तरह-तरह की अंकगणितीय उद्घोषणायें होती रही हैं । मैं समझता हूँ कि साहित्य में गणितीय स्थापनायें नहीं चलतीं। फिर लघुकथा मात्रिक छंद तो नहीं जिसे मात्राओं और शब्दों में बाँधा-छांदा जा सके । पर इसका मतलब नहीं कि उसमें कथा या ललित निबंध जैसी वाचालता की छूट हो । लघुकथा के सभी मान्य आचरणों की अवहेलना यदि लघुकथाकार न करे तो वह स्वयं लघुकथा को सीमित शब्दों में रख सकता है । मैं एक योग्य पाठक होने दृष्टि लघुकथा के समूचे भूगोल को एक ही बार में देखना चाहता हूँ यानी कि शीर्षक से लेकर उसके लेखक का नाम एक ही बार दिख जाये । उसके लिए पन्ना पलटने की बाध्यता न रहे ।

 

लघुकथा लेखकीय उपस्थिति रहित विधा है । लघुकथा और जीवन के मध्य किसी की सत्ता स्वीकार नहीं है । लेखक यहाँ अदृश्य रहता है । उसी अदृश्यता में ही उसकी उपस्थिति होती है । रचना में उसकी उपस्थिति कला को खंडित करती है। उसे बोझिल बनाती है । पाठक और रचना के बीच व्यवधान बनती है । लघुकथाकार की अनुपस्थिति ही लघुकथा को कलासमृद्ध बनाती है । तो हम कह सकते हैं कि लघुकथाकार अन्य विधाकारों से कहीं अधिक त्यागी है । ज्यों-ज्यों लघुकथाकार अपनी उपस्थिति के संभ्रमी दलदल में जा गिरता जाता है त्यों-त्यों लघुकथा की दम घुटने लगता है । कह सकते हैं कि लघुकथा में कला का सीमित प्रक्षेपण होता है । इस मायने में लेखक की अनुशासनप्रियता और सीमितता यहाँ गौरतलब हो सकती है । सीमितता लघुकथाकार का अंकुश है । सीमित शब्दों के सुंसगति से पाठक लघुकथा जैसे बीज में ही पौधे और उसकी समूची हरितिमा से प्लावित हो सकता है ।

 

सच्ची लघुकथा यथार्थ की ईमानदार पड़ोसन है । इस अर्थ में कि वह यथार्थ की संपूर्ण और बारीक से बारीक चुगली में चुकती नही है । उसे विडम्बनाओं से घृणा है । उसे विद्रपताओं से परहेज है । वह है ना आखिर मानवतावादी पड़ोसी । पड़ोसी इस रूप में भी है कि वह आज पाठक के सबसे क़रीब की विधा है । एक आम पाठक कथा, उपन्यास, बाँचने से पूर्व उसके आकार और सीमा का परीक्षण करता है पर लघुकथा पर पहले अपनी आँखों और मन को ले जोड़ता है । लघुकथा ऐसी विधा है जो पाठक के आखों में एक ही बार में अपनी आकृति के साथ दिखाई दे जाती है । प्रकृति भले ही बाद में पता चले पर लघुकथा की यही आकारगत शिल्प उसे अन्य विधाओं से कहीं अधिक पाठकीय आमंत्रण भेजती है । लघुकथा इस मायने में भी लघु है कि वह घाव गंभीर करती है । देखन में छोटे लगे– घाव करे गंभीर ।

 

उसका अर्थशास्त्र बहुत ही अनुशासन की माँग करता है । ठीक उस तरह जिस तरह से मनमोहन सिंह का वित्तीय अनुशासन उन्हें एक दिन प्रधानमंत्री के आसंदी तक ले पहुँचाता है । एक भी शब्द यदि आप नाहक बापरते हैं तो समझिये कि यह आपमें मितव्ययिता के गुण नही है और आपमे मितव्यतिता के गुण नहीं है तो बेहत्तर है कि लघुकथा को दिया जाने वाला समय आपको कथा या फिर ललित निबंध के लिए देना चाहिए जिसे आप-हम जैसे वाचाल रचनाकारों की शख्त ज़रूरत है । तो शब्दानुपयोग में लघुकथाकार को सख़्त और सचेत होना ही चाहिए । कुछ ही अतिरिक्त शब्द आपको लघुकथाकार के श्रेष्ठ पद से च्युत कर सकते हैं और कुछ ही सटीक, सार्थक और सारगर्भित शब्द आपको लघुकथाकार के रूप में स्थापित कर सकते हैं । कह सकते हैं कि अमिधा के बदले लक्षणा और व्यंजना की गांभीर्यता के प्रति कहीं ज़्यादा सचेतता अपरिहार्य है लघुकथा लिखने के लिए । कहा गया है – बातन हाथी पाइये, बातन हाथिन पाँव । प्रकारांतर से कहा जा सकता है कि शब्दों के भीतर प्रवेश किये बिना, उसकी लंबाई, चौड़ाई और गहराई नापे बिना लघुकथा का क्षेत्रफल सिद्ध नहीं किया जा सकता है । लघुकथा दोहे, ग़ज़ल की तरह ऐसी विधा है जिसमें प्रत्येक शब्दों की विश्वसनीयता दर्ज होती है । अन्य विधा को उठाकर देखिए – सैकड़ों और कहीं-कहीं तो हज़ारों शब्द अकारज जगह घेरे दिखाई देते हैं । किसी महानगर में बेजा कब्ज़ा किये हुए बेघरवारों की तरह । लघुकथा साहित्य में ऐसी बसाहट है, जहाँ शब्दों का बेज़ाकब्ज़ा की साफ़ और निहायत मनाही है ।

 

शिल्प की सिद्धि कोई वैयाकरण नही कर सकता । शिल्प निहायत निजी मामला है । यही रचनाकार का व्यक्तित्व भी है। जिस दिन हम शिल्प के वैरायटीज के बारे में अपनी अंतिम राय दे देंगे एक तरह से लघुकथा को परिसीमित करने का व्हीप भी जारी कर रहे होंगें । यह एक तरह से बंदीकरण का कार्य जैसा होगा । वैयाकरण दिशा दे सकते हैं । पर यह कतई ज़रूरी नहीं कि पथिक उसी दिशा में जाये । जो बताये गये मार्ग में चलता है वह जाने-पहचाने गंतव्य तक ही पहुँचता है । असाधारण रचनाकार वही होता है जो अक्सर बिना मार्गदर्शक के खुद मार्ग बनाता है । कदाचित् वही भविष्य में कुछ आगे के लिए गंतव्य-सा बन जाता है ।

 

लघुकथा का आलोचक स्वयं लघुकथाकार को होना पड़ेगा । वह इसलिए कि जहाँ आप छपते हैं ज़रूरी नहीं कि वहाँ कमलेश्वर, रमेश बतरा, बलराम, जगदीश कश्यप, विक्रम सोनी, सतीशराज पुष्करणा, डॉ. राजेन्द्र सोनी या सुकेश साहनी ही मिलें। वहाँ कई बार आप एक फ़ीलर के रूप मे लिये जाते हैं । इसे लेकर आप मुगालते में मत रहिए कि वही लघुकथा का ज्ञाता है। उसे कई बार विधाओं के हिसाब से भी पेज को इंद्रधनुषी रंग में सजाना होता है । आपकी रचना मिली, बस्स, छप गई धड़ाधड़....। जिसे लघुकथाकार पत्र-पत्रिकाओं और पाठकों के लघुकथा की पैठ समझता है कहीं वह कचरा-लेखन का प्रोत्साहन तो नहीं... इस पर भी बारीक आत्मपरीक्षण की आवश्यकता अब भी बनी हुई है ।

 

तो चलिए सीधे लघुकथा के चरित्र पर गौर करते हैं । न अधिक शब्द । न अधिक छंद । न अधिक राग, न ही अधिक द्वेष । लघुकथा अधिक तटस्थ विधा है । लघुकथा सिंहावलोकन वाली विधा है। विहंगलावलोकनीय लेखन की संभावना से परहेज करने वाली विधा । यहाँ उड़ान की गुंजाइश नहीं है । लघुकथा को कथ्य और शिल्प के स्तर पर हम विकल्पहीन विधा के रूप में भी सिद्ध कर सकते हैं । इसके पीछे दो कारण हैं । एक तो यह कि लघुकथा यथार्थ का दर्पण है । वहाँ कल्पना या फैंटेसी के लिए कोई खास स्पेस नहीं है । और है तो भी उतना ही जिससे उसकी विश्वसनीयता अमर रहे । काल्पनिकता तो लघुकथा में उस तरह से होती है जैसे कि देह में साँसें । हम हरदम साँस लेते हैं किन्तु हमें उसका प्रत्य़क्ष अहसास कम ही होता है ।

 

कथ्यों का सही और सटीक चयन, तथ्यों का अनूठा प्रस्तुतिकरण, सारगर्भिता, स्पष्ट दृश्यांकन एक स्वस्थ लघुकथा के आधार हैं जिसका मर्म स्वयं-सिद्ध है । सतर्कता बस यही कि विषय-वस्तु की विश्वसनीयता संदेहास्पद न लगे । कथ्य का कालक्रम इतना अल्प हो कि वहाँ कथायी चरित्तर की अनुगूँजें न सुनाई दे । मन में छाप न छोड़ने वाले पात्रों के प्रति हमदर्दी से बचना एक अच्छे लघुकथाकार का गुण माना जाना चाहिए । यानी कि पात्र ऐसे हों जिनसे संघर्ष का पाठ मिल सके और उदात्तता का भी । लघुकथा का अंत विस्फोटक या मारक हो । पर इसी मारकता के नाम पर चमत्कारिक वाक्यों और उद्धरणों की प्रामाणिकता कहीं संदिग्ध न हो जाये इसकी गांरटी भी लघुकथाकार को लेनी होगी । जहाँ तक शीर्षक की बात है – वह ऐसा हो जैसे देह में सिर । सिर में ही मस्तिष्क, आँख, मुँह, कान, नाक आदि होते हैं जिनके बिना धड़ की कोई खास अहमियत नहीं । जाहिर है शीर्षक लघुकथा के समग्र व्यक्तित्व का सूत्र भी हो ।

 

बहुधा यह भ्रम पैदा होता है कि लघुकथा में कथ्य और पात्र का औसतन चरित्र एक जैसा लगता है पर मुझे लगता है कि भविष्य में नये पात्रों का-संकट नहीं रहेगा । समय परिवर्तनशील है । यही परिवर्तनशीलता उसे नयी घटनाओं, नये पात्रों, नयी मनःस्थितियों, नयी दृष्टियों, नये कथ्यों, नये विषयों से समृद्ध बनायेगी । मैं यहाँ पर सुकेश साहनी के कुछ लघुकथाओं की ओर ध्यान ले जाना चाहूँगा ( जो ई-मेल, इंटरनेट आदि पर केंद्रित और शसक्त लघुकथायें कही जा सकती हैं) जहाँ आप तकनीकी विषयों, प्रसंगों पर की ऐसी लघुकथाओं से रूबरू हो सकते हैं जिसकी कल्पना शायद ही प्रेमचंद कर सकते थे या दास्तोवस्की । तो कहने का आशय यही कि एक समर्पित लघुकथाकार को विषयवस्तु का संकट कभी भी नहीं रहेगा । हाँ, हमें अपनी दृष्टि को पारंपरिक विषयों के इमेज़ से बचाते हुए और अधिक बृहत्तर बनाना होगा । यूँ भी इक्कीसवीं सदी की गंभीर चुनौतियों में जिस तरह हम बाज़ार, वैश्वीकरण, उदारीकरण, अदृश्य उपनिवेशीकरण और उससे जुड़ी तकनीकियों को देख रहे हैं । कथित और आरोपित उत्तर आधुनिकता के विचारों के गंदे नाले में बहकर कुछ भी निश्चित नहीं जैसे विचारों को स्वीकारने के लिए मनुष्य को बरगला रहे हैं यह ज़रूरी है कि वहाँ लघुकथाकार गंभीरता से प्रवेश कर सकता है । यहाँ वह नये समय में अपने सरोकारों को भी ढूँढ सकता है और लघुकथा की सिद्धि को भी चरितार्थ कर सकता है।

 

और हम ऐसा कर सके तो कोई दो मत नहीं कि लघुकथा कविता की तरह पाठक और समाज में अपनी विश्वसनीय सहकारिता दर्ज करा सकती है ।

   जयप्रकाश मानस

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