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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-28, सितम्बर, 2008

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।। हलचल ।।

 

 

 

नसीरुद्दीन शाह का मोटली नाट्योत्सव...

 

मुंबई।मोट्ली का अर्थ है- बहुरंगी, जो प्रसिद्ध सिने अभिनेता, पर उसके पहले से नियमित रंगकर्मी नसीरुद्दीन शाह का रंग समूह है। 1979 से चल रहा है। और बीस सालों में मुझे याद है, मोट्ली ने कभी नाट्योत्सव नहीं किया। इसलिए पूरे सप्ताह का नाट्योत्सव सुनकर ताज्जुब हुआ। लेकिन देखने गया, तो उनके मोट्लीपन में इतना रम गया कि कारण जानने की याद ही न रही- गोया, ऐश में यादेख़ुदा ना रही...

 

इस बहुरंगी (मोटली) उत्सव का सबसे जीवंत व यादगार रंग रहा - कोठरी नं.-42। आधारित तो है यह अथोल फुगार्द के नाटक द आइसलैंड पर, जो अफ्रीकन आइसलैण्ड की जेल के दो कैदियों की कहानी है, पर रूपांतरण इतना अच्छा हुआ है कि मौलिक ही लगता है। सत्ता ने सफ़दर व अर्जुन को क़ैद कर रखा है। गुलामों की तरह उनसे व्यर्थ का श्रम कराया जाता है और  कोडे लगते हैं - घलुआ में...। पर जब वे हारे मन, टूटे बदन से रात को कोठरी में आते हैं, तो एक दूसरे के दुखों की भागीदारी के अलावा प्रेम, दोस्ती, तक़रार, हँसी-मज़ाक... आदि के साथ अपने अतीत की झाँकी भी प्रस्तुत करते हैं, जिसमें पता लगता है के ये लोग सामाजिक सरोकार के लिए लडने वाली क्रांतिकारी हैं। फिर तो इन दो कैदियों के माध्यम से व्यवस्था को बदलने के आन्दोलन की ज़हनियत को जिस त्रासदी, जिजीविषा व फ़न के साथ दिखाया गया है, बहुत असरकारक है। दोनो वहाँ भी किसी अवसर पर ऐंटिगनी नाटक खेलना चाहते हैं - यानी सारी यातना के बावजूद सत्ता की निरंकुशता इन्हें तोड नहीं पायी है। वह जज़्बा मरा नहीं है... और इसी में जिन्दा है जीवन व जीवंत हो उठता है नाटक।

 

अरुणा राजे के कुशल निर्देशन में जिस ढंग से अरविन्द पाँडेय व अभिजित प्रधान ने दोनो भूमिकाएँ निभायी हैं, बस लाजवाब है। दोनो के अभिनय, कथा को भी इतनी पूर्णता दे जाते हैं कि किसी और पात्र की ज़रूरत महसूस नहीं होती। प्रस्तुति में साधनों के सीमित उपयोग हुए हैं, पर अभिनय के साथ ध्वनियों, संकेतों के इतने ख़ूबसूरत प्रयोग हुए हैं कि दोपात्री नाटक एक अदद नाटक सिद्ध होता है। हाँ, कुछ खुली गालियों तथा पेशाब आदि के दृश्य उतने जरूरी न होकर प्रस्तुति को सस्तापन दे जाते हैं। एक घंटे की इस प्रस्तुति के पहले पूर्वार्द्ध में ल्टालो काल्विनो की अँगरेज़ी में चार कहानियों की संगति, अच्छी के बावजूद, कुछ जँचती नहीं।

 

लेकिन हिन्दी में आने के बाद नसीरजी ने जो नाट्यकौशल चुना है, उसमें हैं कहानियाँ ही, पर हिन्दी में वे ज्यों भाती हैं, मुआफ़ी काहता हूँ, अँगरेज़ी में नहीं । इसी क्रम में सबसे बाद की निर्मिति है - कथा कोलाज- दो (कथा कोलाज़-1 भी था, जो बन्द हो चुका है) । इसमें  परसाईजी की आठ व्यंग्य रचनाओं को खेला गया है - टेलीफ़ोन, बेचारा भला आदमी, प्राइवेट कॉलेज का घोषणा पत्र, स्नान, वो ज़रा वाइफ़ हैं न, प्रेमप्रसंग में फादर और समय पर मिलने वाले । इनमें अनाम निर्देशक ने बडी अभिनव रंग कल्पनाओं का समावेश किया है। दृश्य के सन्दर्भ बनाये हैं, जिनसे कहानी खुलती है और प्रस्तुति खिलती है। मंच प्राय: खुला रहता है, जिस पर हर कहानी के अनुसार चलते-फिरते साधन लगते-हटते रहते हैं। इसे जिस नाट्यमयता से प्रस्तुत किया गया है कि हर नाट्यप्रेमी के लिए सौगात बन गया है।

 

यह प्रस्तुति नसीर के इस्मत आपा के नाममंटो-इस्मत हाज़िर हों का विकास है, जिन्हें मोटली को अँगरेज़ी से हिन्दी में भी लाने का श्रेय है। इन्हें शामिल करना उत्सव की गरिमा व इन प्रस्तुतियों के सदाबहार होने के प्रमाण हैं। दोनो में तीन-तीन कहानियाँ हैं। इस्मत.. में आपा की तीनो कहानियाँ विवादास्पद, पर हिट हैं। घरवाली-बाहरवाली को क्या लहकाया है नसीर ने ! और मुग़ल बच्चा को रत्ना ने क्या सहलाया है। छुईमुई को शिबा ने क्या ही गुदगुदाया है। तीनों का सेट लगभग एक ही है। तीनो की ही पृष्ठभूमि में में पीछे सामंती हवेली है। बीचोबीच डबलबेड का गद्दे-गावतकियों से सजा तख्त है। मटके-गिलास-बधनी-नेपकीन का इस्तेमाल जरूर्तन होता रहता है। फिर भी तखत के चारों तरफ़ इतनी जगह है कि क़दम-गति लेकर अभिनय किया जा सके, जिसका सर्वाधिक उपयोग पात्रत्व के मुताबिक नसीर ही करते हैं। मेकअप व परिधान भी दिखता नसीर पर ही है- यूँ कमोबेश तैयार सभी हुए हैं।

 

तीनों के अभिनय में को बड-छोट कहत अपराधू की स्थिति है। नसीर में गति है, तो रत्ना में ठहरे जल की शांति में कंकड के ढब्ब की आवाज़ का समाँ है। इन दोनो के बीच का मंजर है - शिबा की प्रस्तुति। इसके सुनाने के अन्दाज़ में नयी पीढी की दूरी है। रत्ना में पूरा डूबने का अहसास है और नसीर में पूरा डूबकर उतराने के बाद के तैरने का मज़ा है। यह विविधता व समरसता ही इस प्रस्तुति का मज़ा है।

 

इसी वज़न पर बाद में बनी मंटो-इस्मत हाज़िर हों में बूलिहाफ़ कहानियाँ है, जिनकी अपने समय की विवादास्पदता को ही व्यंजित करता है शीर्षक। बू को कुमार विकल ने किया है और लिहाफ़ में पुन: शिबा है। हिबा शाह तो प्राय: सभी नाटकों में है- सबमें मेहनतक़शी के बल फिट भी। दोनो के अलावा मंटो की कम चर्चित, पर अच्छी कहानी टिटवाला का कुत्ता है, जिसे जमील खान ने बहुत अच्छा किया है। इस बार तीनो को सूत्रधारत्व से जोडा गया है, जिसका अपना ही मज़ा है- कंटेंट को जानने का भी व विधान की कला का भी।

 

उप्त दोनो ही प्रस्तुतियों में नसीर के निर्देशन की जो शैली बनी है, उसमें पूरी कहानी बिना रद्दोबदल के पेश होती है। अलग-अलग साभिनय सुनायी जाती हैं, जिसमें कथन भी होता है और अदाकारी भी। कहानी वैसी की वैसी पहुँचे, के अलावा कोई इरादा नहीं होता। इसीलिए सभी में कथा व परिवेश के मुताबिक अलगाव भी होता है, पर सबके बीच एक समानता भी पायी जाती है। हर कहानी का अलग-अलग प्रस्तुत होना नाट्य का बाधक न होकर साधक बनता है। अब मोटली की इस फ़ितरत से दर्शक वाक़िफ़ हो चुका है। सो, ऐसी प्रस्तुतियों का इंतज़ार भी रहता है। हिन्दी नाटकों के अन्य सधे कलाकार हैं- राकेश चतुर्वेदी, अंकुर वकील, ईमाद शाह आदि।

 

उत्सव में अँगरेज़ी के भी दो नाटक खेले गये। 14 साल पहले का बना डीयर लॉयर मोटली का मील का पत्थर है, जो जॉर्ज बर्नार्ड शॉ व पैट्रिक कैम्बेल के पत्रों पर आधारित है। लेकिन नसीर तथा रत्ना शाह के सदाबहार अभिनय से निखरा यह आज भी उतना ही दर्शनीय है। पिछले साल तैयार हुआ है - ऐंटिगनी । यह नाटक शुरू होने के पहले ही सारे पात्र मंच पर आकर कुछ-कुछ करते, बतियाते - कभी दर्शकों से हल्के से मुख़ातिब होते देखे गये, जो समझ में नहीं आया कि प्रयोग की कोई स्टाइल है.. या यूँ ही का फ़न...।

 

जगजाहिर है कि ऐंटिगनी अमानवीय सत्ता के विरोध का नाटक है। इसे तमामो ने खेले हैं - जब वैसे किसी विरोध का सन्दर्भ हो - जैसे डॉ श्रीराम लागू ने इमर्जेंसी के दौरान खेला था। इस बार ऐसा कुछ समझ में नहीं आया, पर ऐसे नाटक तो कभी भी खेले जाते हैं- नाट्य के श्रृंगार जो ठहरे...। यह प्रस्तुति जितनी विद्रोही है, उतनी ही मनोरंजक व विचारोत्तेजक भी। दोनो ही अँगरेज़ी नाटकों में सत्यदेव दुबे का निर्देशन मास्टरपीस है। किशोरी ऐंटिगनी बनी हैं- प्रौढा रत्ना पाठक शाह, तो बूढी आया हैं उनकी बेटी युवा हिबा। उम्र के अनुसार चयन एक़दम उलटा है। पर अभिनय देखकर यह एक़दम सीधा लगने लगता है। रत्ना जैसी फ़बी है कि वय  का पता तो चलता ही नहीं, किशोरी के रूप में सधती भी हैं। वैसे ही शिबा बूढी नौकरानी के रूप में। आकाश खुराना, बेंजामिन गिलानी, केन्नी देसाई... जैसे कलाकारों से समृद्ध यह प्रस्तुति बेजोड है। बस, कहने की हिम्मत करूँ कि क्रेओन में नसीर कुछ अपने जैसा नहीं कर पाते।

 

पर उनके नाम का असर सर चढकर बोलता है। लोग टूट पडते हैं और अन्दर जाने पर मोटली का काम बार-बार आने के लिए राजी कर लेता है। नाट्यरस में निमग्न कर देते लगातार पाँच नाटक बहुत दिनो बाद देखने को मिले, वरना आज तो प्रयोग व व्यवसाय के नाम पर उफ़...।

(ुंबई से सत्यदेव त्रिपाठी की रपट)

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अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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