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पत्थर दिल दुनिया का
पत्थर दिल दुनिया का, कुछ-कुछ भला हो रहा है।
आज किसी कोने मे छुपकर मर्द रो रहा है ।
शुभ ही रहा क्रौंच का मरना, कविता रचवा दी ।
ज्ञानी ध्यानी वैरागी को करुणा उपजा दी ।
गीले गालों पर, बहलिया पाप धो रहा है ।
किरणों को छू कर पर्वत का बर्फ़ पिघलता है ।
अड़ियल अचलेश्वर योगी का आसन हिलता है ।
बड़दादा को भुजबल पर अफ़सोस हो रहा है ।
लगता है अब हवा चलेगी, पानी बरसेगा ।
अगिया बापू कान पकड़कर, सॉरी बोलेगा ।
इत्मिहान में फ़ेल युवक निश्चिंत सो रहा है ।
महेश अनघ
व्यंजना, डी-12, बी, गार्डन
होम्स, अलकापुरी
मध्यप्रदेश - 474006
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