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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-28, सितम्बर, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। गीत ।।

 

 

पत्थर दिल दुनिया का

 

पत्थर दिल दुनिया का, कुछ-कुछ भला हो रहा है।

आज किसी कोने मे छुपकर मर्द रो रहा है ।

 

शुभ ही रहा क्रौंच का मरना, कविता रचवा दी ।

ज्ञानी ध्यानी वैरागी को करुणा उपजा दी ।

गीले गालों पर, बहलिया पाप धो रहा है ।

 

किरणों को छू कर पर्वत का बर्फ़ पिघलता है ।

अड़ियल अचलेश्वर योगी का आसन हिलता है ।

बड़दादा को भुजबल पर अफ़सोस हो रहा है ।

 

लगता है अब हवा चलेगी, पानी बरसेगा ।

अगिया बापू कान पकड़कर, सॉरी बोलेगा ।

इत्मिहान में फ़ेल युवक निश्चिंत सो रहा है ।

 

    महेश अनघ

व्यंजना, डी-12, बी, गार्डन होम्स, अलकापुरी

मध्यप्रदेश - 474006

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