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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-28, सितम्बर, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। गीत ।।

 

 

मौसम सावन का

 

सजनी आँख मिचौली खेले

बांध दुपट्टा झीना

महीना सावन का

कर गया मुश्किल जीना महीना सावन का ।

 

मौसम ने ली है अंगड़ाई, चुनरी उड़ि-उड़ि जाए ।

बैरी बदरा गरजे बरसे, बिजुरी होश उड़ाए ।

घर-आंगन, गलियाँ चौबारा आए चैन कहीं ना ।

 

खेतों में फ़सलें लहराईं, बाग़ में पड़ गये झूले ।

लम्बी पेंग भरी गोरी ने, तन खाए हिचकोले ।

पुरवा संग मन डोले जैसे लहरों बीच सफ़ीना ।

 

बारिश ने जब मुखड़ा चूमा, महक उठी पुरवाई ।

मन की चोरी पकड़ी गई तो धानी चुनर शरमाई ।

छुई-मुई बन गई अचानक चंचंल शोख़ हसीना ।

 

कजरी गाएँ सखियाँ सारी मन की पीर बढ़ाएँ ।

बूंदें लगती बान के जैसे गोरा बदन जलाएँ ।

अब के जो ना आए संवरिया ज़हर पड़ेगा पीना ।

    देवमणि पांडेय

ए-2, हैदराबाद एस्टेट, नेपियन सी रोड़,

मलाबार हिल्स, मुंबई - 400036

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