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मौसम सावन का
सजनी आँख मिचौली
खेले
बांध दुपट्टा
झीना
महीना सावन का
कर गया मुश्किल
जीना महीना सावन का ।
मौसम ने ली है
अंगड़ाई, चुनरी उड़ि-उड़ि जाए ।
बैरी बदरा गरजे
बरसे, बिजुरी होश उड़ाए ।
घर-आंगन,
गलियाँ चौबारा आए
चैन कहीं ना ।
खेतों में फ़सलें
लहराईं, बाग़ में पड़ गये झूले ।
लम्बी पेंग भरी
गोरी ने, तन खाए हिचकोले ।
पुरवा संग मन
डोले जैसे लहरों बीच सफ़ीना ।
बारिश ने जब
मुखड़ा चूमा, महक उठी पुरवाई ।
मन की चोरी पकड़ी
गई तो धानी चुनर शरमाई ।
छुई-मुई बन गई
अचानक चंचंल शोख़ हसीना ।
कजरी गाएँ सखियाँ
सारी मन की पीर बढ़ाएँ ।
बूंदें लगती बान
के जैसे गोरा बदन जलाएँ ।
अब के जो ना आए
संवरिया ज़हर पड़ेगा पीना ।
देवमणि पांडेय
ए-2, हैदराबाद एस्टेट,
नेपियन सी रोड़,
मलाबार हिल्स, मुंबई -
400036
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