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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-28, सितम्बर, 2008

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।। गीत ।।

 

 

सौ-सौ जनम प्रतीक्षा कर लूँ

 

सौ-सौ जनम प्रतीक्षा कर लूँ

प्रिय, मिलने का वचन भरो तो !

 

पलकों-पलकों शूल बुहारूँ, अँसुअन सींचूँ सौरभ गलियाँ ।

भँवरों पर पहरा बिठला दूँ, कहीं न जूठी कर दें कलियाँ ।

फूट पड़े पतझर से लाली, तुम अरुणारे चरण धरो तो !

 

लट बिखराए जोग रमाए, प्रीत कुँआरी तुम्हें बुलाए ।

बैरिन पीड़ा मेरे मन में, बिना धुएँ का हवन कराए ।

साँस-साँस फिर रास रचा ले, बन घनश्याम उमड़ बिखरो तो !

 

रात न मेरी दूध नहाई, प्रात न मेरा फूलों वाला ।

तार-तार हो गया निमोही, काया का रंगीन दुशाला ।

जीवन हो जाए सिंदूरी, तुम चितवन की किरण करो तो !

 

सूरज को अधरों पर धर लूँ, काजल कर आँजूँ अँधियारी ।

युग-युग के पल छिन गिन-गिनकर, बाट निहारूँ प्राण तुम्हारी ।

साँसों की जंजीरे तोडूँ, तुम प्राणों की अगन हरो तो !

    भारत भूषण

मेरठ, उत्तरप्रदेश

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