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सौ-सौ जनम प्रतीक्षा कर लूँ
सौ-सौ जनम प्रतीक्षा कर लूँ
प्रिय, मिलने का वचन भरो तो !
पलकों-पलकों शूल बुहारूँ, अँसुअन सींचूँ सौरभ गलियाँ ।
भँवरों पर पहरा बिठला दूँ, कहीं न जूठी कर दें कलियाँ ।
फूट पड़े पतझर से लाली, तुम अरुणारे चरण धरो
तो !
लट बिखराए जोग रमाए, प्रीत कुँआरी तुम्हें बुलाए ।
बैरिन पीड़ा मेरे मन में, बिना धुएँ का हवन कराए ।
साँस-साँस फिर रास रचा ले, बन घनश्याम उमड़
बिखरो तो !
रात न मेरी दूध नहाई, प्रात न मेरा फूलों वाला ।
तार-तार हो गया निमोही, काया का रंगीन दुशाला ।
जीवन हो जाए सिंदूरी, तुम चितवन की किरण करो
तो !
सूरज को अधरों पर धर लूँ, काजल कर आँजूँ अँधियारी ।
युग-युग के पल छिन गिन-गिनकर, बाट निहारूँ प्राण तुम्हारी ।
साँसों की जंजीरे तोडूँ, तुम प्राणों की अगन
हरो तो !
भारत भूषण
मेरठ, उत्तरप्रदेश
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