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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-28, सितम्बर, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। गीत ।।

 

 

श्वेताए दिन

 

श्वेत कपोतों-से,

श्वेताए दिन ।

 

धूप सने हाथों से, ओस का आचमन ।

पूजा की थाली में, दीपक का उजलापन ।

कर्पूरी गंध रचे,

महकाएँ दिन ।

 

अलसाई आँखों में, सपनों का काजल ।

देहरी को लाँघ रहे, छितराए बादल ।

चंदन-सी पावन अब,

ये ऋचाएँ दिन ।

 

अल्हड़ हवाओं ने, दस्तक की द्वार पर ।

किरणों की झिलमिल है, नदियों की धार पर ।

कोपली इरादों-सी,

भावनाएँ दिन ।

 

    अशोक गीते

194, साईं सदन, रामनगर, कॉलोनी

खंडवा (म.प्र.)

◙◙◙

 

छांदस रचनाएँ

माह का छंदकार

अशोक गीते - नवगीतकार

... श्वेताए दिन

... रिश्ते हुए सब

... धूप का पहरा है

... चटक गए आईने

... वेद ऋचाओं-सी

गीत

ारत भूषण

डॉ. चित्तरंजन कर

महेश अनघ

देवमणि पांडेय

 ग़ज़ल

संजीवन मंयक

विजय राठौर

दोहे

रामनिवास मानव

हाइकू

रचना गौड़ भारती

 प्रवासी ग़ज़लकार

प्राण शर्मा

 अजय गाथा

तुमने ही कहा था

 

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