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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-28, सितम्बर, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। ग़ज़ल ।।

 

 

धूप नज़र आए

 

भले हाद्सों की दुनिया में परचम लहराए ।

मगर भरोसा है शायद हालात सुधर जाए ।

 

धुआँ छुपाले सूरज को इतना दमदार नहीं

तेज़ निगाहें रखें अगर तो धूप नज़र आए ।

 

निर्विकार चेहरे हैं कितने बदहवास चेहरे

असली की परखें तो नकली आप उतर जाए ।

 

आँखें अंधी कान हैं बहरे और जीभ गूँगी

कुछ तो हिम्मत करें कि सबमें प्राण नज़र आए ।

 

शोक गीत के लिए सिर्फ़ अनुबंधित क्यों हैं हम

मंगल गान ही गाए केवल कंठ अगर गाए ।

    विजय राठौर

शासकीय कन्या स्कूल के सामने

जांजगीर, छत्तीसगढ़ - 495668

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