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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-28, सितम्बर, 2008

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।। ग़ज़ल ।।

 

 

संजीवन मयंक की तीन ग़ज़लें

 

एक

लोग चिन्तित यहाँ नई फसल के लिये।

लोग चिन्तित यहाँ नई फसल के लिये

मुझे उतनी ही चिन्ता ग़ज़ल के लिये

आज भी आम हाथों में रोटी नहीं॥

न्याय हो न सका और वो मर गया।

जो भटकता रहा एक नक़ल के लिये॥

प्यास सागर की अब तक बुझी ही नहीं।

वह तरसता है सरिता के जल के लिये॥

झुग्गियाँ इस जगह पर सुहाती नहीं।

ये मुनासिब जगह है महल के लिये॥

हाथ पर हाथ धरे लोग बैठे यहाँ।

चाहिये रहनुमा एक  पहल के लिये॥

ज़िंदगी कुछ उसूलों से चलती नहीं।

कुछ हुनर चाहिये आजकल के लिये॥

 

दो

दूर क्षितिज से सूर्य फिसलने लगता है।

आसमान भी रंग बदलने लगता है॥

ये दस्तूर ज़माने का हमने देखा।

गिरे हुये को और कुचलने लगता है॥

आज आदमी का कोई विश्वास नहीं।

वक़्त देखकर बात बदलने लगता है॥

बच्चा नहीं जानता कोई मजबूरी।

दिखा खिलौना वही मचलने लगता है।

हिम्मत कर जब कोई आगे बढ़ता है।

उसके साथ ज़माना चलने लगता है॥

आज वक़्त के साथ नहीं जो चल पाया।

कल हाथों से वक़्त निकलने लगता है॥
एक दिया जब खुली हवा में जलता है।

गुस्से से तूफ़ान उबलने लगता है॥

 

 

तीन

जब सड़कों पर जनता जाम लगाती है।

तब सत्ता के बात समझ में आती है॥

लोग चाहते है केवल दाना पानी।
मगर हुक़ूमत तो लाठी बरसाती है॥

किसी समस्या को लटकाना ठीक नहीं।

वही गले के फाँस कभी बन जाती है॥

आज तुम्हारा है कुछ भी कर लो।
कभी हमारी भी तो बारी आती है॥

छल-छदों का राज़ जल्द खुल जाता है।

अगर सच्चाई कभी सामने आती है॥

सत्ता की कुर्सी पर सब पुतले बैठे।

डोर कहीं जो इनको नाच नचाती है॥
कहने को हम अभी बहुत कह सकते हैं।

लेकिन घर की बात सड़क पर जाती है॥

    संजीवन मंयक

251-शनिचरा वार्ड-1,नरसिंह गली

होशंगाबाद (म.प्र.)

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